कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context७०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
(१) प्रतिपन्नान् अर्थमानाभ्यां योजयेत् । द्रव्यभक्तच्छिद्रेषु चैनान् द्रव्यभक्तदानैरनुगृह्णीयात् । अप्रतिगृह्णतां स्त्रीकुमारालङ्कारानभिहरेयुः ।
(२) दुर्भिक्षस्तेनाटव्युपघातेषु च पौरजानपदानुत्साहयन्तः सत्रिणो ब्रूयुः—'राजानमनुग्रहं याचामहे, निरनुग्रहाः परत्र गच्छामः' इति ।
(३) तथेति प्रतिपन्नेषु द्रव्यधान्यपरिग्रहैः ।
साचिव्यं कार्यमित्येतदुपजापादद्भुतं महत् ॥इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे उपजापो नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितश्चत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
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( १ ) जो लोग उकसाने में आकर शत्रु राजा का विरोध करने लगें उन्हें अच्छी तरह सत्कृत किया जाय और उन पर धन-अन्न का संकट आने पर उनकी पूरी सहायता की जाय । यदि वे लोग गौरव नष्ट होने के विचार से इस प्रकार अन्न-धन की सहायता लेना मंजूर न करें तो उनके स्त्री-पुत्रों के लिए आभूषण बना कर भेज दिये जायें ।
( २ ) दुर्भिक्ष के समय चोर और आटविकों की लूट-मार की दशा में गुप्तचर शत्रु राजा के ग्रामवासियों; नगरवासियों तथा जनपदवासियों को उत्साहित करते हुए कहें कि 'हम लोग राजा से सहायता की याचना करें । यदि राजा हमारी सहायता नहीं करता है तो हम लोगों को दूसरे राजा के आश्रय में चला जाना चाहिए ।' इस प्रकार शत्रु देश की प्रजा को राजा से भिन्न किया जाय ।
( ३ ) जब शत्रु देश की प्रजा गुप्तचरों की बात से राजी हो जाय तो विजिगीषु राजा को चाहिये कि धन, धान्य और निवास की सुविधा देकर उनकी सहायता करें । शत्रुपक्ष को शत्रु से भिन्न करने का यह अद्भुत उपाय है ।
दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में उपजाप नामक प्रथम अध्याय समाप्त ।
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