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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 791 of 918

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Page 791

प्र० १७१ : अ० १ ] उपजाप ७०७

(१) परस्य मुख्यान्मित्रत्वेनापदिशन्तो दूतव्यञ्जनाः स्वामिसत्कारं ब्रूयुः । स्वपक्षबलाधानं परपक्षप्रतिघातं च तुल्ययोगक्षेमममात्यानामायुधीयानां च कथयेयुः । येषु व्यसनाभ्युदयावेक्षणमपत्यपूजनं प्रयुञ्जीत ।

(२) तेन परपक्षमुत्साहयेद्यथोक्तं पुरस्तात् । भूयश्च वक्ष्यामः—साधारणगर्दभेन दक्षान्, लकुटशाखाहननाभ्यां दण्डचारिणः, कुलैडकेन चोद्विग्नान्, अशनिवर्षेण विमानितान्, विदुलेनावकेशिना वायसपिण्डेन कैतवजमेघेन वा विहताशान्, दुर्भगालङ्कारेण द्वेषिणेति पूजाफलान्, व्याघ्रचर्मणा मृत्युकूटेन चोपहितान्, पीलुविखादनेन करकयोष्ट्र्या गर्दभीक्षीराभिमन्थनेनेति ध्रुवापकारिण इति ।


(१) शत्रुमुख्यों के साथ मित्ररूप में रहने वाले गुप्तचर उनके सामने अपने स्वामी के द्वारा प्राप्त अपने आदर-सत्कार की खूब बड़ाई करें । शत्रु-प्रकृति तथा शत्रु-सेना के सामने वे गुप्तचर अपने पक्ष की सेना की उन्नति और शत्रुपक्ष की सेना के ह्रास अथवा दोनों के समान योगक्षेम की चर्चा करें । अमात्यों और सैनिकों के सामने वे कहें कि उनका राजा विपत्ति के समय अपने अनुचरों की पूरी सहायता करता है तथा अभ्युदय के समय दान, मान, संमान से सबको खुश करता है । किसी भी अधीनस्थ कर्मचारी के मर जाने पर उसके पुत्रों को सत्कृत करता है ।

(२) उक्त सभी कारणों का बखान कर शत्रु के अधीनस्थ कर्मचारियों को उससे भिन्न कर दिया जाय । शत्रुपक्ष में भेद डालने के लिए कुछ उपायों का वर्णन पीछे कर दिया गया है और कुछ विशेष उपाय इस प्रकार हैं : कार्यपटु एवं कर्मठ व्यक्तियों से यह कह दिया जाय कि राजा ने तुमको बिल्कुल गधा बना दिया है । इसी प्रकार सैनिकों से कहा जाय कि राजा ने उन्हें लठैत बना रखा है । शत्रु राजा से भयभीत कर्मचारियों को कहा जाय कि उन्हें झुंड से बिछड़े हुए या जीवन से निराश एक मेढ़े या बकरे की तरह बना दिया है । तिरस्कृत व्यक्तियों को कहा जाय कि किस प्रकार उन्होंने इतने वज्रपात के समान अपमान को चुपचाप पी लिया है । सर्वथा निराश व्यक्तियों को फलहीन बेंत, अखाद्य अन्नपिण्ड या न बरसने वाले बादल की उपमा देकर स्वामी राजा के विरोध में उकसाया जाय । ससंमान आभूषण आदि देकर पुरस्कृत व्यक्तियों से कहा जाय कि व्यभिचारिणी स्त्री को गहना पहनाने से क्या लाभ ? शत्रु द्वारा ठगे गये व्यक्तियों को मृत्यु स्थान; बनावटी व्याघ्र जैसे राजा का उदाहरण दिया जाय । शत्रु के निकटवर्ती सदा ही अपकार करने वाले व्यक्तियों को कहा जाय कि उन्हें तो पीलु वृक्ष का फल खिलाकर, ओले दिखाकर, ऊँटनी तथा गदही का दूध मथने का काम दिया गया है ।