कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १६४-१६५ : अ० ३ ] मण्डलप्रोत्साहन ६९१
येत्—'एष खलु राजा मामुत्पाटच भवत्सु कर्म करिष्यति । बुध्यध्वम्, अहं वः श्रेयानभ्यवपत्तुम्' इति ।
(१) मध्यमस्य प्रहिणुयादुदासीनस्य वा पुनः ।
यथासन्नस्य मोक्षार्थं सर्वस्वेन तदर्पणम् ॥
इति आबलीयसे द्वादशेऽधिकरणे सेनामुख्यवधः मण्डलप्रोत्साहनं चेति तृतीयोऽध्यायः; आदितोः सप्तत्रिंशदुत्तरशततमः ।
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ही यह राजा मेरा उच्छेद कर के तुम्हारा भी उच्छेद कर डालेगा । अतः आप लोग विचार करें और समझें कि इस आपत्ति में आपको मेरी रक्षा करनी चाहिए या नहीं ।'
(१) दुर्बल राजा को चाहिए कि बलवान् शत्रु से अपनी रक्षा के लिए वह मध्यम, उदासीन और अपने समीपस्थ सभी राजाओं को यह संदेश भेजे कि 'सर्वस्व देकर मैं आप लोगों के सामने आत्मसमर्पण कर चुका हूँ । मैं आप लोगों के आश्रय से अलग नहीं हो सकता हूँ । अतः यथाशक्ति आप लोगों को मेरी रक्षा करनी चाहिए ।'
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में सेनामुख्यवध-मण्डलप्रोत्साहन नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।
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