कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १६४-१६५ : अ० ३ ] मण्डलप्रोत्साहन ६८९
(१) येभ्यश्च राजा याचितो ददाति, तान् सत्रिणो ब्रूयुः—'उक्तः शून्य-पालो राज्ञा—अयाच्यमर्थमसौ चासौ च मा याचते, तेभ्यो मया सोऽर्थो विश्वासार्थं दत्तः, शत्रुसंहिताः। तेषामुद्धरणे प्रयतस्व' इति। ततः पूर्व-वदाचरेत्।
(२) ये चैनं याच्यमर्थं न याचन्ते, तान् सत्रिणो ब्रूयुः—'उक्तः शून्यपालो राज्ञा—याच्यमर्थमसौ चासौ च मा न याचते; किमन्यत् स्वदोषशङ्कितत्वात्, तेषामुद्धरणे प्रयतस्व' इति। ततः पूर्ववदाचरेत्।
(३) एतेन सर्वः कृत्यपक्षो व्याख्यातः।
(४) प्रत्यासन्नो वा राजानं सत्री ग्राहयेत् 'असौ चासौ च ते महामात्रः शत्रुपुरुषैः सम्भाषते' इति। प्रतिपन्ने दूष्यानस्य शासनहरान् दर्शयेत्—'एत-त्तत्' इति।
(५) सेनामुख्यप्रकृतिपुरुषान् वा भूम्या हिरण्येन वा लोभयित्वा स्वेषु
अर्थात् तीक्ष्ण गुप्तचर रात में कुछ आदमियों को मार दें; जिनको न मारें उनको वध का भय दिखाकर राजा से फोड़ दें।
(१) माँगने पर जिन्हें राजा कोई वस्तु दे दे उनसे सभी गुप्तचर कहें कि 'राजा ने शून्यपाल से कहा है कि अमुक-अमुक व्यक्तियों ने मुझसे न माँगने योग्य वस्तु माँगी है, मैंने उनको वह वस्तु इसलिए दे दी है कि उनका मुझ पर विश्वास बना रहे; किन्तु वे व्यक्ति शत्रु से मिले हैं, अतः उनका वध करने के लिए तुम्हें यत्नशील रहना चाहिए' ऐसा कहने के बाद पूर्ववत् सब कार्य किया जाय।
(२) जो महामात्र आदि माँगने योग्य वस्तु भी राजा से नहीं माँगते उनसे सभी गुप्तचर कहें 'राजा ने शून्यपाल को कह दिया है कि अमुक-अमुक व्यक्ति मुझसे माँगने योग्य वस्तुओं को भी नहीं माँगते। इसका कारण इसके सिवा दूसरा क्या हो सकता है कि वे अपने दोषों के कारण मुझसे शंकित रहते हैं और इसलिए मेरे पास नहीं आते हैं। तुम उनका वध करने के लिए यत्नशील रहो।' ऐसा कहने के बाद पूर्ववत् सब कार्य किया जाय।
(३) इसी प्रकार क्रुद्ध, लुब्ध, भीत आदि कृत्यपक्ष के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए।
(४) अथवा राजा के पास कपटपूर्वक रहने वाले सभी गुप्तचर राजा से कहें कि 'अमुक-अमुक महामात्र तुम्हारे शत्रुओं के साथ मिले हुए हैं।' जब राजा को इस बात पर विश्वास हो जाय तो सभी राजद्रोहियों द्वारा महामात्र का सन्देश ले जाते हुए दिखा दे और कहे 'देखिए, वही बात हुई, जो मैंने आपसे कही थी।'
(५) अथवा सेना के अध्यक्षों, अमात्य आदि प्रकृतियों और अन्य राजकर्म-चारियों को सभी गुप्तचर धन तथा भूमि आदि के लोभ में फँसाकर उनके अपने ही
४४ कौ०