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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 772 of 918

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Page 772
प्रकरण १६४-१६५## सेनामुख्यवधः मण्डलप्रोत्साहनं च
अध्याय ३

(१) राज्ञो राजवल्लभानां चासन्नाः सत्रिणः पत्त्यश्वरथद्विपमुख्यानां ‘राजा क्रुद्धः’ इति सुहृद्विश्वासेन मित्रस्थानीयेषु कथयेयुः । बहुलीभूते तीक्ष्णाः कृतरात्रिचारप्रतीकाराः गृहेषु ‘स्वामिवचनेन आगम्यताम्’ इति ब्रूयुः तान्निर्गच्छत एवाभिहन्युः । ‘स्वामिसन्देशः’ इति चासन्नान् ब्रूयुः । ये च प्रवासितास्तान् सत्रिणो ब्रूयुः—‘एतत्तद् यदस्माभिः कथितं जीवितुकामेन अपक्रान्तव्यम्’ इति ।

(२) येभ्यश्च राजा याचितो न ददाति तान् सत्रिणो ब्रूयुः—‘उक्तः शून्यपालो राज्ञा—अयाच्यमर्थमसौ चासौ मा याचते, मया प्रत्याख्याताः शत्रु-संहिताः, तेषामुद्धरणे प्रयतस्व’ इति । ततः पूर्ववदाचरेत् ।


सेनापतियों का वध और राजमण्डल की सहायता

( १ ) राजा तथा राजा के प्रियजनों के निकट मित्र बनकर रहने वाले सभी गुप्तचर : पैदल, घुड़सवार, रथसवार तथा हाथीसवार सेनाओं के अध्यक्षों और महामात्रों के मित्रों के यहाँ जाकर अत्यन्त विश्वासी मित्रों की तरह उससे कहें कि ‘सेनाध्यक्ष आदि पर राजा कुपित हो गया है ।’ जब यह प्रवाद सर्वत्र फैल जाय तब, रात्रिभ्रमण की निषेधाज्ञा में भ्रमण करने की अनुमति प्राप्त कर सभी गुप्तचर घर-घर में जाकर सेनाध्यक्ष आदि से कहें कि ‘स्वामी की आज्ञा से आप लोगों को तत्काल स्वामी के पास जाना चाहिए ।’ और जब वे बाहर निकलें तो उन्हें मरवा डालें । तदनन्तर मित्र के वेष में रहने वाले तीक्ष्ण गुप्तचर सभी गुप्तचरों से कहें कि हमने यह सब कार्य स्वामी की आज्ञा से किया है । जो सेनापति आदि पहिले ही राजा को छोड़ कर चले गये हैं उनसे सभी गुप्तचर कहें ‘देखिए, जो हमने कहा था वही हुआ न, कि जो भी अपनी जान बचाना चाहे वह यहाँ से भाग जाय ।’

( २ ) किसी के द्वारा कोई वस्तु माँगी जाने पर राजा जब उस वस्तु को न दे तो उस माँगने वाले से सभी गुप्तचर यों कहें ‘राजा ने शून्यपाल से कह दिया है कि अमुक-अमुक व्यक्तियों ने मुझ से न माँगी जाने योग्य वस्तुएँ माँगी हैं । मैंने देने से इनकार कर दिया । इसलिए कि वे लोग शत्रु से मिल गये हैं । अतः उनको नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील रहो ।’ ऐसा कहने के बाद पूर्ववत् सब कार्य किया जाय;