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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 632 of 918

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Page 632

५४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) सामन्तो बलवतः प्रतिघातोऽन्तर्धिः प्रतिवेशो वा बलवतः पार्ष्णिग्राहो वा स्वयमुपनतः प्रतापोपनतो वा दण्डोपनत इति भृत्यभाविनः सामन्ताः ।
(२) तैर्भूम्येकान्तरा व्याख्याताः ।
(३) तेषां शत्रुविरोधे यन्मित्रमेकार्थतां व्रजेत् ।
शक्त्या तदनुगृह्णीयाद्द्विषहेत यया परम् ॥
(४) प्रसाध्य शत्रुं यन्मित्रं वृद्धं गच्छेदवश्यताम् ।
सामन्तैकान्तराभ्यां तत्प्रकृतिभ्यां विरोधयेत् ॥
(५) तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां भूमिं वा तस्य हारयेत् ।
यथा वानुग्रहापेक्षं वश्यं तिष्ठेत्तथाचरेत् ॥
(६) नोपकुर्यादमित्रं वा गच्छेद्वयतिकर्शितम् ।
तदहीनमवृद्धं च स्थापयेन्मित्रमर्थवित् ॥


(१) सामन्त, बलवान् राजा का मुकाबला करने वाला, अन्तर्धि, (मध्यम), प्रतिवेश (पड़ोस), बलवान् राजा पर पीछे से आक्रमण करने वाला (पार्ष्णिग्राह), स्वयं आश्रित (स्वयं उपनत), बल द्वारा आश्रित (प्रतापोपनत) और सेना द्वारा अधिकसामन्त 'भृत्यभावि' कहलाता है।

(२) उक्त तीन प्रकार के सामन्तों के समान ही भूम्येकान्तर (एक देश के व्यवधान से राज्य करने वाले) मित्रराजाओं के भी १. शत्रुभावि २. मित्रभावि और ३. भृत्यभावि, ये तीन भेद समझ लेने चाहिएँ ।

(३) उन भूम्येकांतर मित्रों में से किसी पर यदि शत्रु आक्रमण करे तो उस मित्र के साथ सन्धि करने वाले राजा को इतनी सेना और सहायता पहुँचानी चाहिए, जिससे वह आक्रमणकारी शत्रु का दमन कर सके ।

(४) अपने शत्रु को जीतकर उन्नत हुआ जो मित्र, विजिगीषु के वश में नहीं रहता, किसी भी तरह उसका विरोध, उसके सामन्त और भूम्येकांतर मित्रों एवं उनकी अमात्य-प्रकृति से करा देना चाहिए ।

(५) अथवा उसके बन्धु-बान्धवों द्वारा या नजरबन्द किये उसके पुत्र आदि के द्वारा उसकी भूमि का अपहरण करा देना चाहिए। अथवा अपनी सहायता चाहता हुआ वह जिस तरह भी वश में रह सके, उसी तरह उसके साथ व्यवहार किया जाय।

(६) क्षीण हुआ जो मित्र विजिगीषु की कोई सहायता न कर सके या शत्रु के साथ मिल जाय, तो विजिगीषु को चाहिए कि उसको ऐसी दशा में रखे, जिससे न तो वह उन्नत हो सके और न ही मिटने पावे ।