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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 631 of 918

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Page 631

प्र० १२४-१२६ : अ० १८ ] मध्यमोदासीनमण्डल-चरित ५४७

(१) उदासीनां वा मध्यमो लिप्सत—‘उदासीनाद्भिद्यताम्’ इति मध्यमोदासीनयोर्यो मण्डलस्याभिप्रेतस्तमाश्रयेत ।
(२) मध्यमचरितेनोदासीनचरितं व्याख्यातम् । उदासीनंश्चेन्मध्यमं लिप्सत, यतः शत्रुमभिसन्दध्यान्मित्रस्योपकारं कुर्यात्, मध्यममुदासीनं वा दण्डोपकारिणं लभेत, ततः परिणमेत ।
(३) एवमुपगृह्यात्मानमरिप्रकृतिं कर्शयेत् । मित्रप्रकृतिं चोपगृह्णीयात्।
(४) सत्यप्यमित्रभावे तस्यानात्मवान् नित्यापकारी शत्रुः शत्रुसहितः पाष्णिग्राहो वा व्यसनी यातव्यो व्यसने वा नेतुर्भियोक्तेत्यरिभाविनः ।
(५) एकार्थाभिप्रयातः पृथगर्थाभिप्रयातः सम्भूययात्रिकः संहितप्रयाणिकः स्वार्थाभिप्रयातः सामुत्थायिकः कोशदण्डयोरन्यतरस्य क्रेता विक्रेता द्वैधीभाविक इति मित्रभाविनः ।


( १ ) यदि मध्यम किसी उदासीन राजा को वश में करना चाहे तो दोनों की फूट को उचित मानकर वह उन दोनों में जो राजमण्डल का अधिक प्रिय हो उसी से सन्धि करे और उसी की सहायता करे ।

( २ ) मध्यम के ही चरित के समान उदासीन का भी चरित समझ लेना चाहिए । यदि उदासीन राजा किसी मध्यम राजा को अपने अधीन करना चाहे तो विजिगीषु को चाहिए कि इन दोनों में से वह उसके साथ जा मिले, जिसकी सहायता से शत्रु का उच्छेद और मित्र का उपकार हो सके; या इन दोनों को अपनी सैनिक सहायता देकर अपने वश में कर ले ।

( ३ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा अपनी वृद्धि करके शत्रु-प्रकृति का नाश और मित्र-प्रकृति का उपकार करे ।

( ४ ) 'शत्रु' शब्द से कहे जाने वाले सामन्त तीन प्रकार के हैं : १. अमित्रभाव रखने वाला सामन्त शत्रुभावि, २. मित्रभाव रखने वाला सामन्त मित्रभावि और ३. भृत्यभाव रखने वाला सामन्त भृत्यभावि । अजितेन्द्रिय, सदा अपकार करने वाला, शत्रुभाव रखने वाला, विजिगीषु के शत्रु की सहायता करने वाला, पाष्णिग्राह, बन्धु आदि की मृत्यु से दुःखी, यातव्य और विजिगीषु को विपत्ति में फँसा हुआ जान कर उस पर आक्रमण करने वाला सामन्त 'शत्रुभावि' कहलाता है ।

( ५ ) एक ही अर्थसिद्धि के लिए विजिगीषु के साथ चढ़ाई करने वाला, अथवा एक ही भूमि पर दो प्रयोजनों के लिए दोनों का चढ़ाई करना; विजिगीषु की सहमति प्राप्त करके युद्ध करने वाला; विजिगीषु के निमित्त ही चढ़ाई करने वाला; शून्य स्थानों को बसाने के लिए धन और सेना, दोनों में से किसी एक को एक दूसरे के बदले में खरीदने या बेचने वाला सामन्त 'मित्रभावि' कहलाता है ।