कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५१९
(१) पार्ष्णिग्राहास्त्रयो ज्ञेयाः शत्रोश्चेष्टानिरोधकाः ।
सामन्ताः पृष्ठतोवर्गः प्रतिवेशौ च पार्श्वयोः ॥(२) अरेर्नेतृश्च मध्यस्थो दुर्बलोऽन्तर्धिरुच्यते ।
प्रतिघाते बलवतो दुर्गाटव्यपसारवान् ॥(३) मध्यमं त्वरिविजिगीष्वोर्लिप्समानयोर्मध्यमस्य पार्ष्णि गृह्णतो लब्धलाभापगमने यो मध्यमं मित्राद्वियोजयति, अमित्रं च मित्रमाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । सन्धेयश्च शत्रुरुपकुर्वाणो, न मित्रं मित्रभावादुत्क्रान्तम् ।
(४) तेनोदासीनलिप्सा व्याख्याता ।
(५) 'पार्ष्णिग्रहणाभियानयोस्तु मन्त्रयुद्धादभ्युच्चयः । व्यायामयुद्धे हि क्षयव्ययाभ्यामुभयोरवृद्धिः । जित्वापि हि क्षीणदण्डकोशः पराजितो भवति' इत्याचार्याः ।
में रहता है, जिसके पास कार्यसिद्धि के लिए दूसरे की अपेक्षा अधिक सेना हो और जो दुर्ग आदि से संपन्न हो, अथवा जो यातव्य का पड़ोसी हो । क्योंकि निकटवर्ती को यदि विशेष लाभ होता है तो वह यातव्य के साथ मिलकर विजिगीषु के मूलस्थान को भी बाधा पहुँचा सकता है । परन्तु दूर रहनेवाले से बाधा की आशंका नहीं रहती है ।
( १ ) शत्रु के कार्य व्यापार को रोकने वाले पार्ष्णिग्राह तीन प्रकार के होते हैं : १. आक्रमण करने वाले राजा के समीपवर्ती २. पीछे रहने वाले और ३. इधर-उधर के, पार्श्ववर्ती ।
( २ ) आक्रमणकारी विजिगीषु और उसके शत्रु के बीच का दुर्बल राजा अन्तर्धि कहलाता है । केवल बलवान् का मुकाबला होने पर वह दुर्ग तथा घने जंगल ( अटवी ) में छिप जाता है । इसीलिए उसका ऐसा अन्वर्थ नाम पड़ा ।
( ३ ) मध्यम राजा को वश में करने की इच्छा रखने वाले शत्रु और विजिगीषु, दोनों में वही विशेष लाभ में रहता है, जो उसका पार्ष्णिग्राह बनता है, और वहाँ से कुछ लाभ प्राप्त कर मध्यम राजा को अपने मित्र से अलग कर देता है तथा जो स्वयं अपने शत्रु तक को अपना मित्र बना लेता है । उपकार करने वाले शत्रु के साथ भी संधि कर लेनी चाहिए और मित्रभाव से शून्य अपकार करने वाले मित्र को भी छोड़ देना चाहिए ।
( ४ ) इसी प्रकार उदासीन राजा को वश में कर लेना चाहिए ।
( ५ ) पार्ष्णिग्राह और आक्रमणकारी, इन दोनों राजाओं में वही अधिक उन्नत हो सकता है, जो मन्त्रयुद्ध से शत्रु का नाश करता है । साधारणतया युद्ध दो प्रकार होता है १. व्यायाम युद्ध और २. मंत्रयुद्ध । युद्धभूमि में उतर कर शस्त्रास्त्र आदि के उपायों द्वारा शत्रु को विच्छिन्न कर देना व्यायामयुद्ध कहलाता है, और बिना युद्ध-भूमि में गये ही सभी तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों द्वारा शत्रु का नाश कराना मंत्रयुद्ध