कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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सोऽतिसन्धत्ते । मित्राभियोगी हि सुखेनावाप्तसिद्धिः पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात् । सुकरो हि मित्रेण सन्धिर्नाममित्रेणेति ।
(१) मित्रममित्रं चोद्धरतोर्योऽमित्रोद्धारिणः पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते । वृद्धमित्रो ह्यमित्रोद्धारी पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, नेतरः स्वपक्षोपघाती ।
(२) तयोरलब्धलाभापगमने यस्यामित्रो महतो लाभाद्वियुक्तः क्षयव्ययाधिको वा, स पार्ष्णिग्राहोऽतिसन्धत्ते । लब्धलाभापगमने यस्यामित्रो लाभेन शक्त्या हीनः, स पार्ष्णिग्राहोऽतिसन्धत्ते । यस्य वा यातव्यः शत्रोर्विग्रहापकारसमर्थः स्यात् ।
(३) पार्ष्णिग्राहयोरपि यः शक्यारम्भबलोपादानाधिकः स्थितशत्रुः पाश्र्वस्थायी वा सोऽतिसन्धत्ते । पार्श्वस्थायी हि यातव्याभिसारो मूलबाधकश्च भवति । मूलाबाधक एव पश्चात्स्थायी ।
आक्रमण करने वाले राजा का पार्ष्णिग्राह बनता है वही विशेष लाभ में रहता है । क्योंकि मित्र पर आक्रमण करने वाला राजा सहज ही में सिद्धि प्राप्त कर लेता है और बलवान् होकर वह पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर सकता है। इसके विपरीत, क्योंकि मित्र के साथ संधि हो जाना सुकर होता है, शत्रु के साथ कठिनता से ही संधि हो सकती है। अतः शत्रु पर आक्रमण करने वाला राजा न तो सिद्धिलाभ कर सकता है और न तो पार्ष्णिग्राह की कुछ हानि कर सकता है ।
( १ ) मित्र और शत्रु का उन्मूलन ( उद्धार ) करने वाले राजाओं में से जो शत्रु का उद्धार करने वाले राजा का पार्ष्णिग्राह बनता है वही विशेष लाभ में रहता है । क्योंकि शत्रु का उद्धार करने वाला राजा स्वपक्ष और मित्रपक्ष से संपन्न होकर पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर सकता है । परन्तु दूसरा, जो मित्र का ही उन्मूलन करना चाहता है, अपने ही पक्ष का घातक होने के कारण, कभी भी पार्ष्णिग्राह का उच्छेद नहीं कर सकता है ।
( २ ) मित्र और शत्रु का उन्मूलन करने वाले राजाओं के कोई विशेष लाभ प्राप्त किये वगैर ही लौट आने पर, उनमें से ऐसे शत्रु पर आक्रमण करने में लाभ है, जिसने कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं किया और जिसका अधिक क्षयव्यय हुआ हो । क्योंकि वह शत्रु को क्षीण कर पार्ष्णिग्राह को भी हानि पहुँचा सकता है । किन्तु विशेष लाभ प्राप्त करके लौट आने पर जिसका शत्रु लाभ तथा शक्ति से हीन हो, ऐसे आक्रमणकारी राजा का पार्ष्णिग्राह बनने में लाभ रहता है । क्योंकि लाभ और शक्ति से संपन्न शत्रु को वश में न कर सकने के कारण वह पार्ष्णिग्राह का कुछ नहीं बिगाड़ पाता है । अथवा जो यातव्य और विजिगीषु के साथ युद्ध करके अपकार करने में असमर्थ हो उसकी पार्ष्णि को दबाने वाला राजा भी विशेष लाभ में रहता है ।
( ३ ) दो समान गुण वाले पार्ष्णिग्राह राजाओं में वही पार्ष्णिग्राह विशेष लाभ