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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 560 of 918

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Page 560
४७६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

(१) विशिष्टादल्पमप्यंशं लब्ध्वा तुष्टमुखो व्रजेत् ।
अनंशो वा ततोऽस्याङ्के प्रहृत्य द्विगुणं हरेत् ॥
(२) कृतार्थस्तु स्वयं नेता विसृजेत् सामवायिकान् ।
अपि जीयेत न जयेन्मण्डलेष्टस्तथा भवेत् ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे यातव्यामित्रयोरभिग्रहचिन्तादि
नाम पञ्चमोऽध्याय, आदितो द्विशततमः ।

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( १ ) अधिक शक्तिशाली विजयी राजा से मित्र राजा को थोड़ा भी हिस्सा मिले या कुछ भी न मिले तो प्रसन्न होकर वह ले और वाद में उसकी किसी निर्बलता पर प्रहार करके दुगुना धन वसूल करे ।

( २ ) विजयी विजिगीषु को चाहिए कि सफल हो जाने पर वह अपने सहायक मित्र राजाओं को सम्मानपूर्वक विदा करे, भले ही विजय का उसको थोड़ा ही हिस्सा उपलब्ध क्यों न हो । ऐसा व्यवहार करने से वह राज-मंडल का प्रियपात्र हो जाता है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में यातव्यमित्रों के अभिग्रहचिन्तादि नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

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