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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 559 of 918

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Page 559

प्र० १०८-११० : अ० ५ ] यान और सामवायिक सम्बन्धी विचार ४७५

धिक्ये वा तौ हि सुखौ भेदयितुम् । दुष्टश्चैको द्वाभ्यां नियन्तुं भेदोपग्रहं चोपगन्तुमिति ।

(१) समेनैकेन द्वाभ्यां हीनाभ्यां वेति । द्वाभ्यां हीनाभ्यां श्रेयः । तौ हि द्विकार्यसाधकौ वश्यौ च भवतः ।

(२) कार्यसिद्धौ तु—

कृतार्थाज्ज्यायसो गूढः सापदेशमपक्रमेत् ।
अशुचेः शुचिवृत्तात्तु प्रतीक्षेताविसर्जनात् ॥

(३)

सत्रादपसरेद् यत्तः कलत्रमपनीय वा ।
समादपि हि लब्धार्थाद्विभ्रस्तस्य भयं भवेत् ॥

(४)

ज्यायस्त्वे चापि लब्धार्थः समो विपरिकल्पते ।
अभ्युच्चितश्चाविश्वास्यो वृद्धिश्चित्तविकारिणी ॥


है। क्योंकि अधिक शक्तिशाली राजा के साथ विजिगीषु को दबकर ही चलना पड़ता है, जबकि समान शक्तिवाले के संबन्ध में यह बात नहीं होती है । और फिर एक सुविधा यह भी है कि दो बराबर शक्ति वाले राजाओं को आपस में सुगमता से फोड़ा जा सकता है । उनमें से किसी एक ने यदि दुष्टता भी की तो दूष्य आदि के द्वारा उसका दमन भी किया जा सकता है ।

(१) समशक्ति एक राजा या हीनशक्ति दो राजाओं में से किस के साथ गठ-बंधन करके युद्ध किया जाना चाहिए ? हीनशक्ति दो राजाओं को साथ लेकर चढ़ाई करनी चाहिए, क्योंकि वे दोनों दो कार्यों को एक साथ कर सकते हैं और विजिगीषु के वश में भी रह सकते हैं।

(२) सहयोगी सामवायिकों का हिस्सा : कार्य सिद्ध हो जाने पर कृतार्थ हुए अधिक शक्ति राजा के मन में यदि बेईमानी आ जाय तो मित्र राजा को चाहिए कि वह वहाँ से चुपचाप चल दे । उसकी ईमानदारी और निष्कपटता को दृष्टि में रखकर तब तक मित्र राजा उसके साथ रहे, जब तक वह न छोड़े ।

(३) कार्यसिद्ध होने पर मित्र राजा को चाहिए कि दुर्ग आदि संकटमय स्थान से अपने परिवार को साथ लेकर वह दूसरी जगह चला जाय । सफल हुए समशक्ति राजा से मित्र राजा को भय बना रहता है ।

(४) वास्तविकता यह है कि चाहे अधिकशक्ति राजा हो या समशक्ति राजा हो, कार्य सिद्ध हो जाने पर उसके दिल में फर्क अवश्य आ जाता है। वृद्धि प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि वह चित्त को विरत कर देती है ।