Skip to content
SarvaKosh
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 557 of 918

Read in context
Page 557

प्र० १०८-११० : अ० ५ ] यान और सामवायिक सम्बन्धी विचार ४७३

पातैः पुरुषकाराणां कर्मणां गुणदूषणैः ।
उपघातैः प्रधानानां मान्यानां चावमाननैः ॥
विरोधनैश्च वृद्धानां वैषम्येणानृतेन च ।
कृतस्याप्रतिकारेण स्थितस्याकरणेन च ॥
राज्ञः प्रमादालस्याभ्यां योगक्षेमवधेन च ।
प्रकृतीनां क्षयो लोभो वैराग्यं चोपजायते ॥
क्षीणाः प्रकृतयो लोभं लुब्धा यान्ति विरागताम् ।
विरक्ता यान्त्यमित्रं वा भर्तारं घ्नन्ति वा स्वयम् ॥

(१) तस्मात् प्रकृतीनां क्षयलोभविरागकारणानि नोत्पादयेत् । उत्पन्नानि वा सद्यः प्रतिकुर्वीत ।

(२) क्षीणा लुब्धा विरक्ता वा प्रकृतय इति । क्षीणाः पीडनोच्छेदन्-भयात् सद्यः सन्धिं युद्धं निष्पतनं वा रोचयन्ते । लुब्धा लोभेनासन्तुष्टाः पजापं लिप्सन्ते । विरक्ताः पराभियोगमभ्युत्तिष्ठन्ते ।


को करने से, अर्थकारी कार्यों को न करने से, चोरों से प्रजा की रक्षा न करने से, चोरी कराने, पुरुषार्थी व्यक्तियों की उपेक्षा करने से, उचित ढंग से संपादित सन्धि-विग्रह आदि कार्यों की निन्दा करने से, अध्यक्ष आदि प्रधान कर्मचारियों पर दोषारोपण करके उन्हें नीच कार्यों में नियुक्त करने से, आचार्य, पुरोहित आदि माननीय व्यक्तियों का तिरस्कार करने से, विषम या मिथ्या बातें कह कर वृद्ध पुरुषों में परस्पर विरोध कराने से, किसी के उपकार को न मानने से, नित्यकर्मों को न करने से, राजा के प्रमाद एवं आलस्य से और योग ( किसी वस्तु की प्राप्ति ) तथा क्षेम ( प्राप्त वस्तु की रक्षा ) का नाश होने से अमात्य आदि प्रकृतिजनों का क्षय हो जाता है । वे लोभी हो जाते हैं एवं उनमें राजा के प्रति वैराग्य की भावना पैदा हो जाती है । क्षय हुए प्रकृतिजन लोभी हो जाते हैं, लोभी होकर वे राजा की ओर से उदासीन हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में वे शत्रु से जा मिलते हैं, अथवा स्वयं ही अपने राजा का वध कर डालते हैं ।

( १ ) इसलिए नीतिनिपुण राजा को चाहिए कि वह अपने प्रकृतिजनों में क्षय, लोभ और विराग के कारणों को पैदा ही न होने दें । यदि किसी कारण वे पैदा हो भी जाँय तो उनका तत्काल प्रतीकार कर दे ।

( २ ) क्षीण, लुब्ध और विरक्त, इन तीन प्रकार की प्रकृतियों को उत्तरोत्तर गुरु समझना चाहिए । पीड़ा और उच्छेद के डर से क्षीण हुआ प्रकृति-मण्डल शीघ्र ही सन्धि, युद्ध या दुर्ग को छोड़ कर पलायन कर देता है । लोभी प्रकृतिमण्डल असन्तोष के कारण शत्रु के वश में चला जाता है । विरक्त प्रकृतमंगल शत्रु के साथ मिलकर विजिगीषु पर आक्रमण करने के लिए तैयार हो जाता है ।