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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 556 of 918

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Page 556
४७२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवां अधिकरण

(१) बलवन्तमन्यायवृत्तिं दुर्बलं वा न्यायवृत्तिमिति, बलवन्तमन्यायवृत्तिं यायात् । बलवन्तमन्यायवृत्तिमभियुक्तं प्रकृतयो नानुगृह्णन्ति, निष्पातयन्त्यमित्रं वास्य भजन्ते । दुर्बलं तु न्यायवृत्तिमभियुक्तं प्रकृतयः परिगृह्णन्ति, अनुनिष्पतन्ति वा ।

(२) अवक्षेपेण हि सतामसतां प्रग्रहेण च ।
अभूतानां च हिंसानामधर्म्याणां प्रवर्तनैः ॥
उचितानां चरित्राणां धर्मिष्ठानां निवर्तनैः ।
अधर्मस्य प्रसङ्गेन धर्मस्यावग्रहेण च ॥
अकार्याणां च करणैः कार्याणां च प्रणाशनैः ।
अप्रदानैश्च देयानामदेयानां च साधनैः ॥
अदण्डनैश्च दण्ड्यानामदण्ड्यानां च दण्डनैः ।
अग्राहाणामुपग्राहैर्ग्राह्याणां चानभिग्रहैः ॥
अनर्थ्यानां च करणैरर्थ्यानां च विघातनैः ।
अरक्षणैश्च चौरेभ्यः स्वयं च परिमोषणैः ॥


और यह भी संभव है कि वे किसी के बहकावे में ही न आवें । वे इस बात को भी भलीभाँति जानते हैं कि अपने राजा में अनुराग रखना ही सब गुणों का मूल है । इसलिये अपने प्रकृतिजनों का अनादर करने वाले यातव्य पर ही पहिले आक्रमण करना श्रेयस्कर है ।'

( १ ) 'अन्यायपूर्वक प्रजा का पालन करने वाले बलवान् यातव्य पर पहिले आक्रमण करना चाहिए या न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करने वाले दुर्बल यातव्य पर ?' ऐसी स्थिति में अन्यायवृत्ति राजा पर ही पहिले आक्रमण करना चाहिए, क्योंकि ऐसे यातव्य पर आक्रमण करने पर उसके अमात्य आदि प्रकृतिजन उसकी सहायता करने के बदले उसको दुर्ग से निकाल देते हैं या शत्रु के साथ जाकर मिल जाते हैं । परन्तु न्यायवृत्ति दुर्बल यातव्य पर आक्रमण करने से उसका प्रकृतिमण्डल प्राण-प्रण से उसकी सहायता करता है और उसके दुर्ग छोड़ देने पर भी बराबर उसकी कल्याण-कामना में ही निरत रहते हैं ।

( २ ) प्रकृतिमण्डल के हेतु : सज्जनों का अनादर करने से, दुर्जनों पर अनुग्रह करने से, अनुचित, अधार्मिक एवं हिंसात्मक कार्यों को करने से, धार्मिक व्यक्तियों द्वारा सदाचरण का त्याग किये जाने से, अनुचित कार्यों को करने से, उचित कार्यों को बिगाड़ देने से, सुपात्रों को दान न देने से; कुपात्रों की सहायता करने से, अपराधियों को दण्ड न देने से, निरपराधों को कठोर दण्ड देने से, त्याज्य व्यक्तियों को पास रखने से, कुलीन एवं सौम्य व्यक्तियों को दूर हटाने से, अनर्थकारी कार्यों