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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 553 of 918

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Page 553

प्र० १०३-१०७ : अ० ४ ] आसन और यान का प्रयोग ४६९

(१) यदा वा फलमेकहार्यमल्पकालं पश्येत्, तदा पार्ष्णिग्राहासाराभ्यां विगृह्य यायात् । विपर्यये सन्धाय यायात् ।
(२) यदा वा पश्येत्—'न शक्यमेकेन यातुमवश्यं च यातव्यम्' इति, तदा समहीनज्यायोभिः सामवायिकैः सम्भूय यायात् । एकत्र निर्दिष्टेनांशेनानेकत्रानिर्दिष्टेनांशेन । तेषामसमवाये दण्डमन्यतरस्मिन् निविष्टांशेन सम्भूयाभिगमनेन वा निर्विशेत । ध्रुवे लाभे निर्दिष्टेनाश्रुवे लाभांशेन ।
(३) अंशो दण्डसमः पूर्वः प्रयाससम उत्तमः ।
विलोपो वा यथालाभं प्रक्षेपसम एव वा ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे विगृह्यासनं, सन्धायासनं, विगृह्ययानं,
सन्ध्याययानं, सम्भूयप्रयाणं नाम चतुर्थोऽध्याय,
आदित एकशततमः ।

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( १ ) अथवा देखे कि 'अकेले ही चढ़ाई करके मैं अभीष्ट फल को प्राप्त कर लूंगा तो पार्ष्णिग्राह और आसार के साथ भी विग्रह करके अपने शत्रु पर चढ़ाई कर दे । और यदि देखे कि 'अकेले ही चढ़ाई करके मैं अभीष्ट फल को प्राप्त न कर सकूँगा' तो सन्धि करके चढ़ाई कर दे ।

( २ ) अथवा जब देखे कि 'मै अकेले ही चढ़ाई करने में असमर्थ हूँ; किन्तु चढ़ाई करनी आवश्यक है' तो ऐसी दशा में सम, हीन तथा अधिक शक्ति वाले राजाओं के साथ गठबन्धन करके चढ़ाई करे । यदि एक ही देश पर चढ़ाई करनी हो तो सहायक राजाओं का हिस्सा निश्चित करके और अनेक देशों पर चढ़ाई करनी हो तो हिस्से का निश्चय किये बिना ही चढ़ाई कर दे । यदि उक्त राजाओं में कोई भी राजा साथ चलने को तैयार न हों तो उनका कुछ हिस्सा निश्चित करके उनसे सेना माँगे । अथवा यह कहे कि इस समय साथ चलकर यदि तुम मेरी सहायता करोगे तो अवसर आने पर मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा ।' यदि आक्रमण करने पर भूमि मिले तो उसमें से पूर्व निश्चित हिस्सा दे दे और दूसरा सामान मिले तो लाभ के अनुसार हिस्सा दे ।

( ३ ) सैन्य-सहायता के अनुसार ही सहायक राजाओं को हिस्सा दिया जाय, यह प्रथम पक्ष है । मेहनत के अनुसार धन दिया जाय, यह उत्तम तरीका है । लूट-पाट में जो जिसके पल्ले पड़ जाय, वह उसी को दिया जाय, यह भी एक पक्ष है । अथवा लड़ाई के समय जिसका जितना खर्च हुआ है उसी के अनुसार उसको हिस्सा दिया जाना चाहिए ।

पाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।

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