कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context४६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
(१) नेति कौटिल्यः । कर्शनमात्रमस्य कुर्याद्व्यसनिनः । परवृद्ध्या तु वृद्धः समुच्छेदनम् ।
(२) एवं परस्य यातव्योऽस्मै साहाय्यमविनष्टः प्रयच्छेत् । तस्मात् सर्वसन्दोहप्रकृतं विगृह्यासीत ।
(३) विगृह्यासनहेतुप्रातिलोम्ये सन्धायासीत ।
(४) विगृह्यासनहेतुभिरभ्युच्चितः सर्वसन्दोहवर्जं विगृह्य यायात् । यदा वा पश्येत्—'व्यसनी परः, प्रकृतिव्यसनं वास्य शेषप्रकृतिभिरप्रकृतिकार्यं, स्वचक्रपीडिता विरक्ता वास्य प्रकृतयः कर्शिता निरुत्साहाः परस्पराद्विग्नाः शक्या लोभयितुम्, अग्न्युदकव्याधिमरकदुर्भिक्षनिमित्तक्षीणयुग्यपुरुषनिचय-रक्षाविधानः परः' इति, तदा विगृह्य यायात् ।
(५) यदा वा पश्येत्—'मित्रमाक्रन्दश्च मे शूरवृद्धानुरक्तप्रकृतिर्विपरीत-प्रकृतिः परः पार्ष्णिग्राहश्चासारश्च, शक्ष्यामि मित्रेणासारमाक्रन्देन पार्ष्णिग्राहं वा विगृह्य यातुम्' इति, तदा विगृह्य यायात् ।
(१) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'कुपित हुआ शत्रु राजा व्यसन-रहित विजिगीषु को उखाड़ नहीं सकता है; थोड़ा-बहुत अनिष्ट अवश्य कर दे। परन्तु विजिगीषु यदि उसके आक्रमण में बाधा न डाले तो अपने शत्रुराजा को निर्विघ्न जीतकर वह विजिगीषु को उखाड़ फेंकने में समर्थ हो सकता है।'
(२) इस प्रकार विग्रह करके चुप बैठ जाने का परिणाम यह होगा कि यातव्य ( जिस पर आक्रमण किया जाय ) राजा अपनी सुरक्षा के लिए विजिगीषु को अवश्य सहायता पहुँचायेगा । इसलिए पूरी ताकत के साथ युद्ध के लिए प्रस्तुत राजा के साथ विग्रह करके ही आसन का अवलम्बन किया जाय ।
(३) विग्रह करके, आसन के जो हेतु बतलाये गये हैं यदि उनसे विपरीत देखें, तो सन्धि करके ही आसन का अवलम्बन करें ।
(४) विग्रह करके यान का अवलम्बन : अथवा जब देखे कि 'शत्रु व्यसनों में फँसा है; उसका प्रकृत-मंडल भी व्यसनों में उलझा है, अपनी सेनाओं से पीड़ित उसकी प्रजा उससे विरक्त हो गई है, राजा स्वयं उत्साहहीन है, प्रकृतिमण्डल में परस्पर कलह है; उसको लोभ देकर फोड़ा जा सकता है; शत्रु, अग्नि, जल, व्याधि, संक्रामक रोग के कारण वह अपने वाहन, कर्मचारी और कोष की रक्षा न कर सकने के कारण क्षीण हो चुका है' तो, ऐसी दशाओं में विग्रह करके चढ़ाई ( यान ) कर दे ।
(५) अथवा जब देखे कि 'मेरे आगे-पीछे के मित्रराजा सूर, अनुभवी एवं अनुरक्त प्रकृति-मण्डल से सम्पन्न हैं और शत्रु के मित्र राजा सर्वथा विपन्नावस्था में हैं: यही स्थिति पार्ष्णिग्राह और आसार राजाओं की भी है; ऐसी दशा में मैं मित्र के साथ आसार को और आक्रंद के साथ पार्ष्णिग्राह को भिड़ाकर शत्रु को जीत सकूँगा' तो विग्रह करके चढ़ाई कर दे ।