कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context४५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
पदो मामागमिष्यति ततः कर्मसु वृद्धिं प्राप्स्यामि, विपन्नकर्मारम्भो वा विषयस्थः परः कर्मसु न मे विक्रमेत, परतः प्रवृत्तकर्मारम्भो वा ताभ्यां संहितः कर्मसु वृद्धिं प्राप्स्यामि, शत्रुप्रतिबद्धं वा शत्रुना सन्धिं विधाय मण्डलं भेत्स्यामि, भिन्नमवाप्स्यामि, दण्डानुग्रहेण वा शत्रुमुपगृह्य मण्डल-लिप्सायां विद्वेषं ग्राहयिष्यामि, विद्विष्टं तेनैव घातयिष्यामि' इति सन्धिना वृद्धिमातिष्ठेत् ।
(१) यदि वा पश्येत्—'आयुधीयप्रायः श्रेणीप्रायो वा मे जनपदः शैल-वननदीदुर्गैकद्वारारक्षो वा शक्ष्यति पराभियोगं प्रतिहन्तुमिति, विषयान्ते दुर्गमविषह्यमपाकृतो वा शक्ष्यामि परकर्माण्युपहन्तुमिति, व्यसनपीडोपह-तोत्साहो वा परः संप्राप्तकर्मोपघातकाल इति, विगृहीतस्यान्यतो वा शक्ष्यामि जनपदमपवाहयितुमिति विग्रहे स्थितो वृद्धिमातिष्ठेत् ।
(२) यदि वा मन्येत—'न मे शक्तः परः कर्माण्युपहन्तुम्, नाहं तस्य
इसके साथ संधि करके यह मेरे शत्रु राष्ट्र को पीडा पहुँचायेगा, या दूसरे से सताया हुआ दूसरा राष्ट्र, इसके साथ संधि कर लेने पर मेरे चंगुल में आ जायेगा, जिससे मैं अपने कर्मों को अधिक बढ़ा सकूँगा, या दुर्ग आदि के नष्ट हो जाने पर आपत्ति में पड़ा मेरा शत्रु मुझ पर आक्रमण न कर सकेगा या कदाचित् दूसरे शत्रु की सहायता से उसने अपने कार्यों का पुनरुद्धार करना आरंभ कर दिया, तब भी दोनों के साथ संधि करके मैं अपने कार्यों को उन्नत बनाये रख सकूँगा, या शत्रु के साथ मिले हुए मंडल को, शत्रु के साथ संधि करके, उन दोनों में फूट डाल दूँगा, तथा मंडल से भिन्न हुए राजा को अपने वश में कर सकूँगा, अथवा सैनिक सहायता से वश में करके मैं मंडल के साथ मिल जाने की उसकी इच्छा को उलट दूँगा, बाद में द्वेष हो जाने पर मंडल के द्वारा ही उसको मरवा दूँगा'—इस प्रकार की स्थितियों में संधि करके अपनी उन्नति करनी चाहिए ।
(१) इसके विपरीत, विजिगीषु राजा यदि समझे कि 'मेरे देश में आयुधजीवी क्षत्रिय और कृषक अधिक हैं, मेरे देश में पहाड़, जंगल, नदी तथा किले बहुत हैं, मेरे राज्य में जाने-आने के लिए भी एक ही मार्ग है, शत्रु के किसी भी आक्रमण का प्रतीकार मेरा देश हर तरह से करने में समर्थ है, या राज्य की सीमा पर अति दुर्भेद्य दुर्ग का आश्रय लेकर शत्रु के कार्यों का विनाशकाल अब समीप आ पहुँचा है, अथवा विग्रह करते हुए शत्रु के जनपद को मैं किसी दूसरे रास्ते से पार कर लूंगा'—यदि ऐसा समझे तो विग्रह कर दे । ऐसी अवस्थाओं में विग्रह करके ही वह अपनी उन्नति करे ।
(२) अथवा विजीगीषु समझे कि 'शत्रु मेरे कार्यों को नष्ट नहीं कर सकता है और मैं भी उसके कार्यों का नाश नहीं कर सकता हूँ, अथवा समान शक्ति वाले कुत्तों