कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ९८-९९ : अ० १ ] सन्ध्यादि छह गुण ४५५
(१) यस्मिन् वा गुणे स्थितः स्वकर्मवृद्धिं क्षयं वा नाभिपश्येत्, एतत्तस्थानम्।
(२) 'ह्रस्वतरं वृद्धद्युदयतरं वा स्थास्यामि विपरीतं पर' इति ज्ञात्वा स्थानमुपेक्षेत।
(३) तुल्यकालफलोदये वा स्थाने सन्धिमुपेयादित्याचार्याः।
(४) नैतद्विभाषितमिति कौटिल्यः।
(५) यदि वा पश्येत्—'सन्धौ' स्थितो महाफलैः स्वकर्मभिः परकर्माण्युपहनिष्यामि, महाफलानि वा स्वकर्माण्युपभोक्ष्ये, परकर्माणि वा, सन्धिविश्वासेन वा योगोपनिषत्प्रणिधिभिः परकर्माण्युपहनिष्यामि, सुखं वा सानुग्रहपरिहारसौकर्यं फललाभभूयस्त्वेन स्वकर्मणा परकर्मयोगावहं जनमास्रावयिष्यामि, बलिनातिमात्रेण वा संहितः परः स्वकर्मोपघातं प्राप्स्यति, तेन वा विगृहीतो मया सन्धत्ते, तेन अस्य विग्रहं दीर्घं करिष्यामि, मया वा संहितस्य मद्द्वेषिणो जनपदं पीडयिष्यति, परोपहतो वास्य जन-
(१) अथवा जिस गुण का आश्रय लेने पर अपनी वृद्धि और अपना क्षय कुछ भी न देखे, ऐसी समान स्थिति को स्थान कहते हैं।
(२) यदि वह समझे कि 'मेरी ऐसी दशा थोड़े समय तक रहेगी और शत्रु की बहुत दिनों तक; मेरी यह दशा उदयोन्मुख होगी और शत्रु की क्षयोन्मुख', ऐसी स्थिति में अपनी उस दशा की कोई चिन्ता न करे।
(३) पुरातन आचार्यों का सुझाव है कि 'यदि शत्रु राजा का भी स्थान समकालीन और उदयोन्मुखी हो तो उसके साथ सन्धि कर लेनी चाहिए।'
(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'पूर्वाचार्यों का यह सुझाव बहुत ही अनुपयुक्त है।'
(५) किसी विशेष स्थिति में यदि विजिगीषु राजा यह देखे कि 'सन्धि कर लेने पर अपने शक्तिशाली कर्मों से मैं शत्रु के कर्मों का उन्मूलन कर दूँगा; या अपने ही महान फलदायक कर्मों की भाँति शत्रु के कर्मों का उपभोग भी संधि-विश्वास से कर सकूँगा अथवा संधि के बहाने गुप्तचरों तथा विष प्रयोगों द्वारा शत्रु के कर्मों को नष्ट कर सकूँगा, या सन्धि के बहाने शत्रु के कार्यकुशल व्यक्तियों को उत्तम फल तथा पर्याप्त लाभ का प्रलोभन देकर अपने देश में खींच लाऊँगा, जिससे मेरे कृष्य आदि कार्य अधिक लाभदायी होंगे, अथवा अधिक बलवान् शत्रु के साथ संधि करने पर शत्रु को बहुत धन देना पड़ेगा और कोष को क्षीण करने पर वह अपने कर्मों को क्षीण कर लेगा, अथवा शत्रु का जिसके साथ विग्रह हो उसके साथ संधि करके मैं अपने शत्रु के साथ होने वाले विग्रह को अधिक दिनों तक बनाये रखूँगा, अथवा