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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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गृहस्थ-जीवन के दायित्व से निवृत्ति प्राप्त करने के संबंध में हमारे पूर्वाचार्यों ने विशेष नियम निर्धारित किये हैं। सामान्यतया गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों से ५० वर्ष की आयु के बाद छुटकारा पाया जा सकता है; किन्तु उससे पूर्व कुछ अनिवार्य शर्तों को पूरा करना आवश्यक बताया गया है। मनु (६।१) ने कहा है कि 'द्विज को चाहिए कि दृढ़ प्रतिज्ञ होकर इन्द्रियों को वश में करके वह वन में निवास करे।' साथ ही उसने अवकाश ग्रहण करने के संबंध में कहा है (६।२) कि 'जब शरीर की त्वचा में सिकुड़न पड़ जाय और वाल फूलने लगें, तब उस व्यक्ति को गृहस्थ से अवकाश ले लेना चाहिए।' (अर्थशास्त्र, पृ० ८०) ने कहा है कि 'जो व्यक्ति मैथुन-भोग्य-अवस्था को पार कर जाता है, वह अपनी संपत्ति का सम्यक् वितरण करके साधु हो सकता है।'

संन्यास या वानप्रस्थ-जीवन ग्रहण करने से पूर्व एक बात यह भी कही गई है कि जब तक कोई व्यक्ति अपने पुत्र के पुत्र को नहीं देख लेता, वह अवकाश ग्रहण करने का अधिकारी नहीं है। इसका आशय यह है कि अवकाश ग्रहण करने से पूर्व प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुत्र को इस योग्य बना देना चाहिए कि वह परिवार और समाज की भलाई के लिए गृहस्थ के कर्त्तव्यों का भार वहन के सर्वथा योग्य हो सके। कौटिल्य ने इस शर्त का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को अपराधी घोषित किया है और कहा है 'यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी और अपने पुत्रों के भरण-पोषण का प्रबंध किये बिना तपस्वी का जीवन ग्रहण कर लेता है तो वह दण्ड का भागी है।'

समाज और परिवार की उन्नति को दृष्टि में रखकर अपने कर्तव्यों का पूरी तरह निर्वाह करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति वानप्रस्थ और उसके बाद पवित्र संन्यास-जीवन धारण कर सकता है। हिन्दुओं की धर्म-व्यवस्था में वैयक्तिक आत्मोन्नति की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक बताया गया है कि पहिले वह नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन की मंजिलों को क्रमशः पार कर उसके बाद वानप्रस्थ या संन्यास का ऊँचा जीवन बिता सकता है।

समाज की अभ्युन्नति और जीवन में सदाचार एवं नैतिकता बनाये रखने के लिए हिन्दुओं की धर्म-व्यवस्था में आदि से ही विवाह को एक श्रेष्ठ आदर्श के रूप में ग्रहण किया गया है। हिन्दुओं के धर्मग्रन्थों में विवाह के लिए भिन्न गोत्र की व्यवस्था पर बड़ा जोर दिया गया है, जिसके फलस्वरूप पति और