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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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सिद्धांत बहुत पहिले ही से चला आ रहा था ( आर० सी० मजूमदार : कार-पोरेट लाइफ इन ऐंशिअंट इण्डिया, पृ० ३६४ ) ।

अपनी चतुराई और बुद्धि के प्रभाव से ब्राह्मणों ने धार्मिक तथा सामा-जिक क्षेत्र में श्रेष्ठता प्राप्त कर ली थी । यद्यपि वे शासक नहीं रहे, फिर भी पुरोहितों, सचिवों, न्यायाधीशों के सारे शासन-संचालन संबंधी अधिकार उन्हें प्राप्त थे और उन्होंने ही चारों वर्गों के लिए एवं आश्रम संबंधी व्यवस्था के लिए नियम भी बनाये ।

श्रम के इस वंशगत विभाजन के कारण समाज में अनेक जातियां पनपने लगीं थीं। भारत की पुरातन समाज-व्यवस्था में हमें देखने को मिलता है कि राजनीतिक दृष्टि से भले ही उसने अनेक पराजयों को देखा था, किन्तु घोर आपत्ति और कठिन संकट में भी एकता की भावना को उसने खोया नहीं। अनेक श्रेणियों, वर्गों, वर्णों, जातियों, भाषाओं और धर्मों के बावजूद भी भारतीय जनता की नैतिक तथा बौद्धिक शक्ति कभी भी क्षीण नहीं हुई।

कौटिल्य ने वर्णाश्रम की व्यवस्था से मर्यादित समाज को सुखकर और मुक्तिदायी बताया है। यह मर्यादित वर्णाश्रम-व्यवस्था अपने-अपने धर्म के पालन में बतायी गयी है (अर्थशास्त्र, पृ० १३) ।

वर्णाश्रम की व्यवस्था का महत्त्व हिन्दू समाज में लगभग अनादि है। प्राचीन भारत में व्यष्टि और समष्टि के क्रिया-क्षेत्रों को एक दूसरे से भिन्न माना गया है; किन्तु उनकी पूर्णता पारस्परिक समन्वय में ही बतायी गयी है। कुछ व्यक्तिगत नियम ऐसे हैं, जिनका पालन करके या जिनको जीवन में उतार कर व्यक्ति अपना उत्थान कर स्वयं को इस योग्य बना पाता है कि वह दूसरे का या सारे मानव समाज का उत्थान कर सके। व्यक्ति और समष्टि के उत्थान हेतु प्राचीन भारत में जो नियम-निर्देश निर्धारित किये गये थे, उन्हीं को वर्णा-श्रम नाम दिया गया।

वर्ण-व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति को सामूहिक हित-चिंतना की ओर ले जाता है, जब कि आश्रम-व्यवस्था उसको व्यक्तिगत उन्नयन की ओर आकर्षित करती है, जिससे कि तप तथा त्याग के द्वारा वह अपने कलुषों एवं असन्तोषों को भस्म कर स्वयं को इस योग्य बना पाता है कि समाज के अभ्युदय में वह उपयोगी सिद्ध हो सके।

वर्णाश्रम-व्यवस्था की इसी मर्यादा को कौटिल्य ने अपनाया है और उसी के कल्याणमय स्वरूप को उन्होंने यों रखा है।

४ कौ० भू०