कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
DevanagariSanskritpublished918 pages
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| २४४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
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(१) समाहर्ता जनपदं चिन्तयेदेवमुत्थितः ।
चिन्तयेयुश्च संस्थास्ताः संस्थाश्चान्याः स्वयोनयः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गृहपतितापसव्यञ्जनप्रणिधिर्नाम पंचविंशोऽ-
ध्यायः, आदितः पञ्चपञ्चाशः ।
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(१) इस प्रकार अपने कार्यों में तत्पर समाहर्त्ता जनपद की रक्षा का प्रबन्ध करें और उसकी आज्ञा से कार्य करने वाले गुप्तचर एवं उनके विभिन्न संघ, संस्था आदि जनपद के प्रबन्ध में तत्पर रहें।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गृहपतितापसव्यञ्जन प्रणिधि
पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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