कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context२०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) निष्क्रयश्चतुर्विंशतिसाहस्रो गणिकायाः। द्वादशसाहस्रो गणिकापुत्रस्य। अष्टवर्षात्प्रभृति राज्ञः कुशीलवकर्म कुर्यात्।
(२) गणिकादासी भग्नभोगा कोष्ठागारे महानसे वा कर्म कुर्यात्। अविशन्ती सपादपणमवरुद्धा मासवेतनं दद्यात्।
(३) भोगं दायमायं व्ययमायतिं च गणिकाया निबन्धयेत्। अतिव्ययकर्म च वारयेत्।
(४) मातृहस्तादन्यत्राभरणन्यासे सपादचतुष्पणो दण्डः। स्वापतेयं विक्रयमाधानं नयन्त्याः सपादपञ्चाशत्पणो दण्डः।
(५) चतुर्विंशतिपणो वाक्पारुष्ये। द्विगुणो दण्डपारुष्ये। सपादपञ्चाशत्पणः पणोऽर्धपणश्च कर्णच्छेदने।
(६) अकामायाः कुमार्या वा साहसे उत्तमो दण्डः। सकामायाः पूर्वः साहसदण्डः।
(१) जो गणिकाएँ राजवृत्ति से अपने को मुक्त करना चाहें, वे राजा को चौवीस हजार पण देकर स्वतन्त्र हो सकती हैं। यदि वेश्यापुत्र राजसेवा से निवृत्त होना चाहे तो वह बारह पण अदा करे। यदि वह मुक्त होने का मूल्य (निष्क्रय) अदा करने में असमर्थ हो तो आठ वर्ष तक राजा के यहाँ चारण का कार्य कर अपने आप को मुक्त कर सकता है।
(२) वेश्या की दासी जब बूढ़ी हो जाये तो उसे कोष्ठागार या रसोई के कार्य में नियुक्त कर देना चाहिए। यदि वह काम न करना चाहे और किसी पुरुष की स्त्री बन कर रहना चाहे, वह प्रतिमास उस गणिका को सवा पण वेतन दे।
(३) गणिकाध्यक्ष को चाहिए कि वह वेश्याओं के भोगधन (सम्भोग से प्राप्त हुई आमदनी), माता से मिला धन (दायभाग), संभोग के अतिरिक्त आमदनी (आय) और भावी-प्रभाव (आयति) आदि को रजिस्टर में दर्ज करता रहे, और उन्हें अधिक खर्च करने से रोकता रहे।
(४) यदि गणिका अपने आभूषणों को अपनी माता के सिवा किसी दूसरे के हाथ सौंपे तो उसे सवा चार पण दण्ड दिया जाय। यदि वह अपने गहने, कपड़े, बर्तन आदि को बेचे या गिरवी रखे तो उस पर सवा पचास पण का दण्ड किया जाय।
(५) यदि वह किसी के साथ कठोरता का बर्ताव करे तो उसे चौबीस पण का दण्ड दिया जाय। यदि वह हाथ, पैर, लाठी आदि से प्रहार करे तो दुगुना (अड़तालीस पण) दण्ड दिया जाय। यदि वह किसी का कान, हाथ काट ले तो उसे पौने बावन पण का दण्ड दिया जाय।
(६) यदि कोई पुरुष कामनारहित कुमारी पर बलात्कार करे तो उसे उत्तम