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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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Page 140
५६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पहला अधिकरण

वुद्धेजयेयुः । मद्यकामं योगपानेनोद्वेजयेयुः । द्यूतकामं कापटिकैः पुरुषैरुद्वेजयेषुः । मृगयाकामं प्रतिरोधकव्यञ्जनैस्त्रासयेयुः । पितरि विक्रमबुद्धिं तथेत्यनुप्रविश्य भेदयेयुः । अप्रार्थनीयो राजा, विपन्ने घातः, सम्पन्ने नरकपातः, संक्रोशः प्रजाभिरेकलोष्टवधश्चेति ।

(१) विरागं प्रियमेकपुत्रं वा बध्नीयात् । बहुपुत्रः प्रत्यन्तमन्यविषयं वा प्रेषयेद्यत्र गर्भः पण्यं डिम्बो वा न भवेत् । आत्मसम्पन्नं सैनापत्ये यौवराज्ये वा स्थापयेत् ।

(२) बुद्धिमानाहार्यबुद्धिर्दुर्बुद्धिरिति पुत्रविशेषाः । शिष्यमाणो धर्मार्थावुपलभते चानुतिष्ठति च बुद्धिमान् । उपलभमानो नानुतिष्ठत्याहार्यबुद्धिः । अपायनित्यो धर्मार्थद्वेषी चेति दुर्बुद्धिः ।


तो उस समय उसके संरक्षकों को चाहिए कि आयर्विश धारण की हुई अपवित्र, घृण्य स्त्रियों को रात्रि के एकांत में राजकुमार के निकट भेज कर उसके मन में ऐसी घृणा तथा खिन्नता पैदा करायें कि परस्त्री की चाह से उसका मन सर्वथा फिर जाय । यदि वह मद्य पीने की इच्छा करे तो मद्य में कोई ऐसा पदार्थ मिलाकर उसको दिया जाय, जिससे कि मद्य के लिए उसकी अरुचि हो जाय । यदि वह जुआ खेलने की कामना करे तो छली-कपटी लोगों के साथ बैठाकर उसको इतना उद्विग्न किया जाय कि आगे से वह जूआ खेलने का नाम भी न ले । यदि वह शिकार खेलना चाहता है तो कपटवेश धारण किये हुए राजपुरुष बेचैन करके उधर से उसके मन को खिन्न कर दें । यदि वह पिता पर आक्रमण करने की इच्छा रखता है तो पहिले तो उसे बढ़ावा दिया जाय किन्तु ऐन मौके पर उससे कहें 'देखो, राजा के साथ कभी द्वेष नहीं करना चाहिए । यदि तुम असफल हो गए तो तुम्हारी मृत्यु अवश्यंभावी है और जीत भी गए तो पितृघातक होने के कारण तुमको घोर नरक भोगना पड़ेगा, सारी प्रजा तुमको लानत देगी और कोई असंभव नहीं कि एकमत होकर प्रजा तुम्हारा प्राणान्त कर दे । इसलिए तुम्हे इस भयंकर पाप-कर्म से बचना चाहिए ।'

( १ ) यदि एक ही राजपुत्र हो, और वह भी पितृद्रोही निकले तो उसे कैद कर देना चाहिए । यदि पुत्र अधिक हों तो उस द्रोही पुत्र को सीमांत प्रदेश अथवा किसी दूसरे देश में प्रवासित कर देना चाहिए, जहाँ कि उचित अन्न-वस्त्र प्राप्त न हो और जहाँ की प्रजा की उसके प्रति कोई सहानुभूति न हो । इसके विपरीत जो राजपुत्र आत्मगुणसंपन्न हो, उसको सेनापति या युवराज के उच्च पद पर नियुक्त किया जाय ।

( २ ) राजपुत्रों की तीन श्रेणियां हैं : १. बुद्धिमान्, २. आहार्यबुद्धि और ३. दुर्बुद्धि । जो धर्म और अर्थविषयक उपदेश को उचित रीति से ग्रहण करके तदनुसार आचरण करता है, वह 'बुद्धिमान्' है । जो धर्म और अर्थ को समझ तो लेता है,