कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० १२ : अ० १६ ] राजपुत्रों से राजा की रक्षा ५५
कुलमविनीतपुत्रमभियुक्तमात्रं भज्येत । तस्मादृतुमत्यां महिष्याम् ऋत्विजश्चरुमैन्द्राबार्हस्पत्यं निर्वपेयुः । आपन्नसत्त्वायां कौमारभृत्यो गर्भभर्मणि प्रजने च वियतेत । प्रजातायाः पुत्रसंस्कारं पुरोहितः कुर्यात् । समर्थं तद्विदो विनयेयुः ।
(१) सत्रिणामेकश्चैनं मृगयाद्यूतमद्यस्त्रीभिः प्रलोभयेत्—पितरि विक्रम्य राज्यं गृहाणेति । तदन्यः सत्री प्रतिषेधयेद् इत्याम्भीयाः ।
(२) महादोषमबुद्धबोधनमिति कौटिल्यः । नवं हि द्रव्यं येन येनार्थजातेनोपदिह्यते तत्तदाचूषति । एवमयं नवबुद्धिर्यद्यदुच्येत तत्तच्छास्त्रोपदेशमिवाभिजानाति । तस्माद् धर्ममर्थं चास्योपदिशेन्नाधर्ममनर्थं च ।
(३) सत्रिणस्त्वेनं तव स्म इति वदन्तः पालयेयुः । यौवनोत्सेकात् परस्त्रीषु मनः कुर्वाणमार्याव्यञ्जनाभिः स्त्रीभिरमेध्याभिः शून्यागारेषु रात्रा-
के समान अनर्थकारी बताते हैं। उनका कहना है 'राजकुमारों को इस प्रकार विषय-भोग में फँसाना उन्हें जीते ही मृत्यु के मुख में दे देना है। जिस प्रकार घुन लगी लकड़ी शीघ्र ही नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार अशिक्षित राजकुमारों का कुल बिना युद्ध आदि के ही विनष्ट हो जाता है। इसलिए राजा को चाहिए कि जब रानी ऋतुमती हो, तो (संतति की) ऐश्वर्य, विद्या, बुद्धि के निमित्त ऋत्विक्, इंद्र और वृहस्पति आदि देवताओं के लिये हविदान किया जाय। जब महारानी गर्भवती हो जाय तो कौमारभृत्य अंग के ज्ञाता शिशु-चिकित्सकों के निर्देशानुसार गर्भ की पुष्टि तथा उसके सुखपूर्वक प्रजनन के लिए यत्न किया जाय। राजकुमार के पैदा हो जाने पर विद्वान् पुरोहित विधिपूर्वक उसका संस्कार करें। जब वह समझने योग्य हो जावे तो विभिन्न विषयों के पारंगत विद्वान् उसको शिक्षा दें।'
(१) आचार्य आंभ के मतानुयायियों का कहना है कि 'सत्रियों (गुप्तचरों) में से कोई एक सत्री राजकुमार को मृगया, द्यूत, मद्य और स्त्रियों का प्रलोभन दे। यह भी कहे कि पिता पर आक्रमण करके तुम राज्य को ले लो, फिर मौज करो। इस पर दूसरा सत्री कहे ऐसा करना बहुत बुरा है।'
(२) आचार्य कौटिल्य के मतानुसार राजकुमार के भीतर यह कुबुद्धि जगाना बहुत ही अनिष्टदायी है। उनका तर्क एवं सुझाव है कि 'सरलमति बालकों में ऐसी कुबुद्धि पैदा करना महादोष कहा जायगा। जैसे मिट्टी का नया बर्तन घी, तेल आदि जिस भी नये द्रव्य का स्पर्श पाकर उसी को चूस लेता है, ठीक वैसे ही, अपरिपक्व बुद्धिवाले बालक को जो कुछ भी सिखाया जाता है, उसको वह शास्त्र-उपदेश की भाँति अमिट रूप से बुद्धि में जमा लेता है। इसलिये सरलमति बालकों को धर्म, अर्थ का ही उपदेश देना चाहिए, अधर्म, अनर्थ का नहीं।'
(३) सत्री लोग 'हम आपके ही हैं' इस अपनत्व को दर्शित करते हुए, राजपुत्र का पालन करें। यदि राजकुमार का युवा मन परस्त्री के लिए बेचैन हो उठता है