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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

DevanagariHindipublished361 pages

Page 136 of 361

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Page 136

१०४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
नानुचरणानि निनयनेज्या ॥३॥ वास्तोष्पतीयैः कुलि-
जकृष्टे दक्षिणतोऽग्नेःसम्भारमाहरति ॥४॥ वास्तोष्पत्या-
दीनि महाशान्तिमावपते ॥५॥ मध्यमे गर्ते दर्भेषु व्रीहि-
यवमावपति ॥६॥ शान्त्युदकशष्पशर्करमन्येषु॥७॥ इहैव
ध्रुवामिति मीयमानामुच्छ्रीयमाणामनुमन्त्रयते ॥ ८ ॥
अभ्यज्यतेनेति मन्त्रोक्तम् ॥ ९ ॥ पूर्णं नारीत्युदकुम्भ-
मग्निमादाय प्रपद्यन्ते ॥१०॥ ध्रुवाभ्यां दृंहयति ॥११॥
शम्भुमयोभुभ्यां विष्यन्दयति ॥१२॥ वास्तोष्पते प्रति-
जानीह्यस्मान् स्वावेशो अनमीवो न एधि ॥ यत्त्वेमहे
प्रति नस्तज्जुषस्व चतुष्पदो द्विपद आवेशयेह ॥ अन-
मीवो वास्तोष्पते विश्वा रूपाण्याविशन् ॥ सखा सु-
शेव एधि न इति, वास्तोष्पतये क्षीरौदनस्य जुहोति ॥१३॥
सर्वान्नानि ब्राह्मणान् भोजयति ॥१४॥ मङ्गल्यानि ॥१५॥
से यज्ञ करे ॥ ३॥ अब शाला कर्म को कहते हैं ॥ जल पात्र को
अभिमंत्रण करके जिस भूमि में घर बनाना हो वहाँ जल लावे । उसी
भूमि पर चरु पकावे या इयेन याग करे और वास्तोष्पतीय गणों से
कुलिज कृष्ट भूमि पर अग्नि के दक्षिण भाग में गृह सम्बन्धि सामानों
को इकट्ठा कर घरे ॥ ४॥ "इहैव ध्रुवां०” इत्यादि पांच गणों के तृप्र-
प्रभृति प्रतीकों से आवपन करे ॥ ५॥ वास्तुभूमि के बीच के गर्त्त में
कुशोपर धान्य, यव डाले ॥ ६॥ और अन्य गर्तों में शान्तिजल,
विरूढ शर्करा डाले ॥ ७॥ "इहैव ध्रुवां०” से नापे जाने वाले बीच के
स्थूणा और शाला को अनुमंत्रण करे ॥ ८ ॥ “अभ्यज्यर्तेन०” से बाँस
को आरोपण करे ( स्थूणा के बास को ) ॥ ९ ॥ "पूर्ण नारी०” से जल-
पूर्ण घट को पकड़ कर दूसरी ऋचा से अग्नि को लेकर दूसरे लोग घर
में प्रवेश करें ॥१०॥ "इहैव ध्रुवाभ्यां०” इन दो ऋचाओं से दृढ़ करे
॥११॥ "शम्भुमयोभुभ्यां०” से जल से वास्तुभूमि को गीला करे, जल
कुम्भ को घर में ढक देवे ॥१२॥ "वास्तोष्पते प्रति०” इत्यादि से
वास्तोष्पति देवता के लिये क्षीरौदन की आहुति देवे ॥१२॥ और सब