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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

DevanagariHindipublished361 pages

Page 135 of 361

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Page 135

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०३
बुसावतक्षणानि सव्यायां पादपाष्ण्र्यां निदधाति ॥२१॥
अपनॊदनापाघाभ्यामन्वीक्षं प्रतिजपति ॥२२॥ दीर्घा-
युत्वायति मन्त्रोक्तं बध्नाति ॥२३॥६॥४२॥
कर्शफस्येति पिशङ्गसूत्रमरल्डुदण्डं यदाययुधम् ॥ १ ॥
फलीकरणैर्धूपयति ॥ २ ॥ अतिधन्वानीत्यवसाननिवेश-
केशस्तुक से लेकर उत्तर भाग तक के पलाश के पत्र से चावल के
गुण्डे से आहुति देकर शेष को वापस लावै ॥ १९ ॥ २०॥ चावलका
गुण्डा, तुष, बुस, काठ का अवतक्षण सव्य पैर के पाष्र्णी में घरे और
अपनॊदन “आरे असौ०” और “अप नः शोशुचदघं०” इन दो सूक्तों
का जप करता हुआ पाप लक्षणा को देखे तो उसके पाप लक्षण नष्ट
हो जायंगे ॥२२॥ “दीर्घायुत्वाय” मंत्र से जंगिड मणि को बान्धे
तो रोग रहित होकर चिरजीवी होगा ॥२३॥६॥४२॥
यह बयालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ ४२ ॥
अब पुनर्विघ्नशमन कर्म को कहते हैं । पिङ्गलवर्ण सूत्र में बांधकर,
अरल्डुमणि को लाकर अभिमंत्रण करके बान्धे । विस्कन्ध विघ्नशमन
मणिको बांधने से स्पर्धमान पुरुष की स्पर्धा को नाश करता है ।
वेणु दण्डादि को लाकर सूक्तोक्त मंत्रों से मार्जन करके धारण करे ।
चित्र दण्ड, ध्वज दण्ड, लकुट आदि दण्ड आदि सब दण्डों को सम्पादन
कर सूक्त से मार्जित कर धारण करने से सर्प, श्रृङ्गि, दण्डादि विघ्न
नहीं होता है ॥ आयुध (हथियार कोई) लाकर अभिमंत्रण करके
सूक्त से मार्जन करके धारण करे । सब ही शस्त्रों को सम्पादन कर
अभिमंत्रण करके मायादिक का माया जाल युद्ध में निवारण होता है,
संग्राम में इन्द्रजाल का निवारण होता है । युद्ध में विघ्न नहीं होता है।
शत्रु हव का निवारण करता है ॥ शत्रु लोग जाते हैं । स्पर्द्धमान शत्रु
को जीतता है। हव की विनाश करता है ॥ १ ॥ विघ्न गृहीत पुरुष को
चावल के गुण्डे से धूप करे तो शत्रु के आरम्भ कार्य सिद्ध नहीं होते ॥२॥
अवसान (निधान देश) और निवेशन (घर) । अवसान में
अनुचरण होता है और निवेशन में निनयन होता है ॥ निन-
यन नाम शान्तिजल से संप्रोक्षण करना । “अति धन्वानि०”
इन दो ऋचाओं से अवसान, निवेशन, अनुचरण और निनयन