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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

DevanagariHindipublished361 pages

Page 131 of 361

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Page 131

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ९९
मवधायाप्सु निदधाति ॥७॥ अयं ते योनिरा नो भर
धीतो वेत्स्यर्थमुत्थास्यन्नुपदधीत ॥८॥जपति ॥६॥ पूर्वास्व-
षाढासु गर्तं खनति ॥१०॥ उत्तरासु सञ्चिनोति ॥११॥
आदेवनं संस्तीर्य ॥१२॥ उद्भिन्दतीं सञ्जयन्तीं यथा
वृक्षमशनिरिद्मुग्रायेति वासितानक्षानिवपति ॥ १३ ॥
अम्बयो यन्ति शम्भुमयोभू हिरण्यवर्णा यददः पुनन्तु
मा सस्रुषीर्हिमवतः प्रस्रवन्ति वायोः पूतः पवित्रेण शं
पात्र से ढालुआ करके संप्रोक्षण करके मट्टी के कच्चे पात्र में पत्थर को
डाल कर सब को जल में फेक देवे ॥७॥ जमीन में गड़े हुए धन को
उत्थापन करने में विघ्न की शान्ति कहेंगे । अर्थ उपार्जन के उद्योग
करना चाहने वाले, द्रव्य, हाथी, घोड़ा, रत्न, सोना, धन-धान्यादि
की कामना वाले, यदि वणिज आदि उद्योग करें, जो घर बनाना आरम्भ
करते हैं परन्तु वह घर आदि तैयार नहीं हो पाता ; इन पूर्वोक्त सब
ही कामना वाले इस कर्मको अर्थात् “अयं ते योनिरा नो भर धीती वा०”
इत्यादि से हवि की आहुति करें । यथाविधि सूत्रोक्त मंत्रों का जप
करें । और उपस्थान करें ॥८॥६॥ अब द्यूतजय कर्म कहते हैं । पूर्वाषाढा
नक्षत्र में गर्त्त खनन करे और उत्तराषाढ़ नक्षत्र में उसे भर देवे ॥१०॥
११॥ द्यूतशाला (जुआ खेलने का घर) को छा बनाकर “उद्भिन्दतीं
यथा वृक्षमशनिरिद्मुग्राय०” से त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या
तीन तिथियों में दही, मधु से अक्षों (पासों) को या कौडियों को
(खेलने की) वासित करके इन वासित पासों या कौडियों से
जूआ खेले ॥१३॥ और “अम्बयो यन्ति०” इत्यादि सूक्तद्वारा अभि-
वर्षण और अवसेचन करे ॥ १४ ॥ अब अर्थोपार्जन के उद्यम करने
में विघ्न के शान्तिकर्म को कहते हैं । स्पष्टीकरण-उपयुक्त औषधियों
को सम्पादन कर औंधे धर कर जल में विप्लावन करे ॥ कुत्ते
का शिर, भेड़ का शिर, मनुष्य के केश, पुराना जूता, जलपात्र, ये
अभिवर्षण कर्म होते हैं, एक २ सूक्त के ॥ कोई २ आचार्य मारुत
के स्थान में मन्त्रोक्त देवता याग करे, जैसे वरुण को; ऐसा कहते हैं ।
औषधिहोम समान ही है, जैसे वर्षा कर्मोंका । जल घट को लाकर