कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in context९८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
समुत्पतन्तु प्र नभस्वेति वर्षकामो द्वादशरात्रमनु-
शुष्येत् ॥१॥ सर्वव्रत उपश्राम्यति ॥२॥ मरुतो यजते
यथा वरुणं जुहोति ॥ ३ ॥ ओषधीः सम्पातवतीः प्रवे-
श्याभिन्युब्जति ॥४॥ विप्रावयेत ॥५॥ श्वशिरएटक-
शिरःकेशरजरदुपानहो वंशाग्रे प्रबध्य योधयति ॥ ६ ॥
उदपात्रेण सम्पातवता सम्प्रोक्ष्यामपात्रं त्रिपादेऽश्मान-
मणि बनाकर काले बाल से बान्धे । इससे वीर्य्य करण, उत्थापन (शिश्न
का) स्थूल करण और रेत का नाश भी होता है ॥१६॥१७॥१८॥-४॥
४०॥ यह चालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥४०॥
अब वृष्टि कर्म विधि को कहेंगे । वर्षा की कामनावाला पुरुष
“समुत्पतन्तु प्रनभस्व०” इत्यादि सूक्त से १२ रात्रि अनुशोषण करे अर्थात्
३ दिन प्रातःकाल, ३ दिन सायंकाल इस प्रकार १२ रात्रि तक
करे । तेरहवें दिन पाकयज्ञिक तन्त्रानुसार व्रतोत्थापनान्त तक करके
“देवस्य त्वा सवितुः०” इत्यादि “मरुद्भ्यो जुष्टं निर्वपामि मरुद्भ्य-
स्त्वा जुष्टं प्रोक्षामि०” इस यजु मंत्र से तब तक समान करे, जब तक
आज्यभाग की दो आहुतियाँ करे । तब क्षीरौदन की आहुति देवे ।
“समुत्पतन्तु०” इत्यादि सूक्त की ५ ऋचाओं से एक आहुति करे, फिर
५ ऋचा से दूसरी, छः ऋचा से तीसरी आहुति देवे । इसके अनन्तर
पार्वणादि उत्तर तन्त्र कर पाकयज्ञिक क्रिया कर आज्यभागान्त तक
करके “प्रनभस्व०” से क्षीरौदन की एक आहुति करे । “न धंनस्तताप०”
इस ऋचा से दूसरी आहुति “युक्ताभ्यां०” से तीसरी आहुति करे ।
और पार्वण आदि उत्तर तंत्र को बर्हिर्होम में “मरुतो गच्छतु हविः
स्वाहा” से करे ॥ सब ही वृष्टि कर्मों में काली गौ का घृत, उसीका
दूध, काला धान्य, वेत का खुवा, वेत की समिद्, वेतका इंधन करे ॥१॥
२॥ काश, दिविधुवक, वेतस, इनको इकट्ठा करके जल में पात्र को
औंधे मुख कर लावे ॥ जल में उसै प्लावन करे ॥३॥४॥५॥ कुत्ते के
शिर को अभिमंत्रण कर जल में विप्लावन करे । भेड़ के शिर को
अभिमंत्रण करके जल में डाले । मनुष्य के केश, रज्जु, पुराने जूते
बाँस के अग्रभाग में बान्धकर योधयति का जप करता हुआ ॥६॥ जल-