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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

DevanagariHindipublished361 pages

Page 122 of 361

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Page 122

९० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ष्ट्वाधाय शयने विकृते सम्पातानतिनयति ॥४॥ अनती-
काशमवच्छाद्यारजोवित्ते कुमार्यौ येन हरेतां ततो नष्टम्
॥५॥ एवं सीरे साक्षे ॥६॥ लोष्टानां कुमारीमाह यमि-
च्छसि तमादत्स्वेति ॥७॥ आकृतिलोष्टवल्मीकौ कल्या-
णम् ॥ ८ ॥ चतुष्पथाद्बहुचारिणी ॥ ९ ॥ श्मशानान्न-
चिरं जीवति ॥१०॥ उदकाञ्जलिं निनयेत्याह ॥११॥ प्रा-
चीनमपक्षिपन्त्यां कल्याणम् ॥१२॥१॥३७॥
जरायुज इति दुर्द्दिनमायन्प्रत्युत्तिष्ठति ॥१॥ अन्वृ-
चमुदवञ्जैः॥२॥ अस्युल्मुककिष्कुरूनादाय ॥३॥ नग्नो लला-
की परीक्षा करने में यह कर्म करे— "वेनस्तत्०॥ सूक्त से घड़े को अखण्ड
नये वस्त्र से लपेट कर शयनी के पास धर देवे और चिन्ता करे । यदि
घड़े को अत्यन्त वेष्टन होजावे तो कार्य सिद्धि ॥४॥ "वेनस्तत्०"
सूक्त से अखण्ड नये वस्त्र द्वारा हलको लपेट कर धरे एवं अभिमंत्रण
कर अनतीकाश को अवच्छादन कर दो कुमारी जिसके द्वारा हरण करे-
उसीसे नष्ट हुआ जाने ॥ ५ ॥ अक्ष को कुम्भ की तरह करके धरे, दो
कुमारी जिसके द्वारा हरण करे—उससे नष्ट जानो ॥ ६ ॥ चार मट्टी के
ढेले को ग्रहण करके "वेनस्तत्०" सूक्त से अभिमंत्रण करके कुमारी को
कहे कि तुम इनमें से जिसे चाहो लेलो ॥ यदि दोनों ग्रहण कर लेवे तो
अभीष्ट सिद्धि जानो ॥ ७ ॥ आकृतिलोष्ट, दीमक, चतुष्पथ, मरघट इन
चार ढेलों में से यदि कुमारी पहिले दो ढेलों को ग्रहण करे तो जानना
कल्याण है । चौराही के ढेला लेने से व्यभिचारिणी होगी, मरघट के
ढेले लेने से अल्पायु होगी ॥ ८ ॥ ६ ॥ १० ॥ यह कुमारी विज्ञान
हुआ ॥ कुमारी से कहे कि पूर्व दिशा में अंजलि में जल लेकर के फेको तो
अभिप्रेत फल होगा ॥ ११ ॥ १२ ॥ १ ॥ ३७ ॥ यह सैंतीसवीं कंडिका
समाप्त हुई ॥ ३७ ॥
अब नैमित्तिक कर्म्मों को कहते हैं । अब दुर्द्दिन के विनाश करने के
कर्मों को कहेंगे । दुर्द्दिन के सम्मुख—"जरायुज०" सूक्त का जप कर
उपस्थान करे ॥१॥ और प्रत्येक ऋचा से जल देवे ॥२॥ तलवार लेकर