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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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दशम लम्बक ८२५
वह अविश्वासी पति उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता था। वह चित्रस्थ पुरुषों से भी उसके
चरित्र के पतन की आशंका करता था ॥१४३॥
एकबार किसी आवश्यक कार्य से वह पुरुष पत्नी को साथ ही लेकर दूसरे देश
को गया॥१४४॥
आगे के जंगली मार्ग में वह भीलों को देखकर भय से अपनी पत्नी को एक गांव के बूढ़े
ब्राह्मण के घर में रखकर उस जंगल में गया ॥१४५॥
उस ब्राह्मण के घर रहती हुई उस स्त्री ने उस मार्ग से भीलों को जाते हुए देखा और एक
युवा भील के साथ वह निर्लज्ज स्त्री ईर्ष्यालु पति को छोड़कर इस प्रकार निकल भागी जैसे
वेगवती नदी बाँध तोड़कर निकल जाती है ॥१४६ १४७॥
जब उसका पति अपना कार्य समाप्त करके वहाँ आया तब उसने उस ग्रामीण वृद्ध से
अपनी स्त्री की मांग की ॥१४८॥
'मैं नहीं जानता कि वह कहाँ गई, इतना अवश्य है कि यहाँ कुछ भील आये थे सम्भवतः
वे ही उसे ले गये हों। भीलों का वह गाँव भी यहीं पास में है। शीघ्र जाओ। तुम्हें स्त्री मिलेगी।
मेरे प्रति कुछ विपरीत बुद्धि न करो' ॥१४९ १५०॥
ब्राह्मण से इस प्रकार कहा गया वह रोता-कलपता और अपनी बुद्धि की निन्दा करता हुआ
भीलों के गाँव में गया और वहाँ जाकर उसने अपनी पत्नी को भी देखा ॥१५१॥
वह पापिन स्त्री भी उसे देखकर डरी हुई-सी उसके पास आकर बोली- मेरा अपराध
नहीं है। मुझे भील बलपूर्वक ले आया' ॥१५२॥
'चलो जबतक कोई देखता नहीं यहाँ गाँव में चलें। इस प्रकार कहते हुए उस प्रेमान्ध
पति से वह बोली —॥१५३॥
'शिकार पर गये हुए उस भील के आने का समय हो गया है। आने पर वह पीछे दौड़कर
मुझे और तुझे दोनों को मार डालेगा ॥१५४॥
इसलिए, इस गुफ़ा में घुस कर बैठो। रात में सोये हुए उसे मारकर निडर होकर
चलेंगे ॥१५५॥
उस दुष्टा स्त्री से इस प्रकार कहा गया वह मूर्ख उसी गुफा में घुसकर बैठ गया क्योंकि
काम से अन्ध व्यक्ति के हृदय में विवेक के लिए स्थान नहीं होता ॥१५६॥
उस दुष्टा स्त्री ने सायंकाल घर पर आये हुए उस भील को दुर्बलमन के कारण आया
हुआ अपना पति दिखा दिया ॥१५७॥
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