कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
DevanagariHindipublished1,079 pages
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Read in contextPage 860दशम लम्बक ८१५
दशम लम्बक ८१५
कौआ कछुआ मृग और चूहे की कथा¹
किसी वन में एक ओर विशाल सेमल का वृक्ष था। उसमें लघुपाती नाम का एक
कौआ घोंसला बनाकर रहता था ॥५८॥
किसी समय अपने घोंसले में बैठ हुए उसने वृक्ष के नीचे हाथ में जाल और लाठी लिये
हुए एक भयानक पुरुष (बहेलिये) को आते देखा ॥५९॥
जबतक वह देख ही रहा था कि इतने में वह बहेलिया जाल बिछाकर और वहाँ दाने छीट
कर वहीं छिप गया ॥६०॥
इतने में ही चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का सरदार, सैंकड़ों कबूतरों के साथ आकाश
में भ्रमण करता हुआ उधर आ निकला ॥६१॥
जाल में फैले हुए पर्याप्त अन्न-बीजों को देखकर वह अपने साथियों के सहित उस जाल पर
उतर आया और अपने साथियों के साथ ही उसमें फँस गया ॥६२॥
सब कबूतरों को फँसा हुआ देखकर उनका राजा चित्रग्रीव उनसे बोला—'तुम लोग
अपनी-अपनी चोंचों से जाल को पकड़कर वेग से आकाश में उड़ चलो' ॥६३॥
उसकी आज्ञा को स्वीकार करके सभी कबूतर जाल को लेकर कुछ डरते हुए आकाश
में उड़ने लगे ॥६४॥
यह देखकर घबराया हुआ वह बहेलिया ऊपर की ओर आँखें किया हुआ उठा और
वहाँ से निराश लौट गया ॥६५॥
तब निर्भय होकर चित्रग्रीव ने अपने साथी कबूतरों से कहा—'चलो अपने मित्र
हिरण्यक चूहे के पास चलें। वह हमारे इन जालों को काटकर हमें मुक्त कर देगा ॥६६॥
ऐसा कहकर और जाल को लेकर उड़ते हुए वे चित्रग्रीव के मित्र चूहे के बिल के पास
पहुँचकर आकाश से उतरे ॥६७॥
'ऐ हिरण्यक निकल आओ। मैं चित्रग्रीव आया हूँ। ऐसा कहकर कपोतराज ने उस चूहे
को आवाज दी ॥६८॥
चूहा यह सुनकर और द्वार के मार्ग से अपने मित्र को आया हुआ देखकर, सौ मुँहवाले
अपने उस बिल से बाहर निकल आया ॥६९॥
१ यहाँ से पंचतन्त्र का मित्रलाभ-प्रकरण प्रारम्भ होता है जिसका प्रारम्भ श्लोक
इस प्रकार है—
असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्त सुहृत्तमाः।
साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत् ॥
२ पंचतन्त्र और हितोपदेश में इसका नाम लघुपतनक है।