कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 844 of 1079
Read in contextऔर, उसने पत्थर से मारकर, उस सूचीमुख के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। इसलिए, उससे
हित की बात कभी न कहनी चाहिए, जो न माने ॥२१॥
'अब मैं क्या कहूँ तूने इन दोनों में भेद कराकर अहित किया है। दुष्ट बुद्धि से जो भी किया
जाता है, वह शुभ (अच्छा) नहीं होता' ॥२१ ॥
धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि वैश्यों की कथा
प्राचीन समय में किसी नगर में धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि नाम के दो वणिकपुत्र थे। वे
दोनों धन कमाने के लिए अपने पिता के घर से दूसरे देश में गये और दैवयोग से उन्होंने दो
सहस्र दीनार कमाये ॥२११-२१२॥
उन्हें लेकर वे अपने घर लौट आये और उन्होंने एक वृक्ष के नीचे उन दीनारों को गाड़
दिया ॥२१३॥
और, एक सौ दीनार लेकर तथा पिता की सम्पत्ति का बराबर बँटवारा करके वे पिता के
घर में रहने लगे ॥२१४॥
एक बार, व्यर्थ व्यय करनेवाला दुष्टबुद्धि वन में जाकर उस वृक्ष के नीचे गड़े सारे
धन को अकेले ही निकाल लाया ॥२१५॥
एक महीना बीत जाने पर दुष्टबुद्धि ने धर्मबुद्धि से कहा—'चलो उन दीनारों का भी बँटवारा
कर लें। इस समय मुझे कुछ व्यय की आवश्यकता है' ॥२१६॥
यह सुनकर धर्मबुद्धि ने उसी दुष्टबुद्धि के साथ जाकर उस स्थान को खोदा जहाँ दीनार
गड़े थे ॥२१७॥
जब उस गड्ढे से दीनार न मिले तब दुष्टबुद्धि धर्मबुद्धि से बोला—'तू ही सारे दीनार निकाल
ले गया। उनमें से आधा मुझे दे। धर्मबुद्धि बोला—'उन्हें मैं नहीं ले गया तू ही ले गया
है' ॥२१८-२१९॥
इस प्रकार, कलह होने पर दुष्टबुद्धि ने पत्थर से अपना सिर फोड़ लिया और धर्मबुद्धि
को न्यायालय में ले जाकर उस पर अभियोग (मुकदमा) कर दिया ॥२२ ॥
न्यायालय में अपने-अपने पक्ष की बात कहते हुए उन दोनों को अधिकारियों ने दिन-भर
वहीं बैठाये रखा ॥२२१॥
तब दुष्टबुद्धि ने कहा—'जिस वृक्ष के नीचे दीनार गड़े थे वह वृक्ष साक्षी है और वह
कहता है कि दीनार धर्मबुद्धि ने लिये'॥२२२॥