Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 822 of 1079

Read in context
Page 822

दशम लम्बक ७७५
दमनक के इस प्रकार कहने पर सिंह ने कहा कि 'तुम समर्थ हो तो जाओ। स्वामी से
यह सुनकर वह यमुना-तट पर गया ॥६३॥
वहाँ पर जब वह शब्द के अनुसार चुपचाप जा रहा था तब उसने घास चरते हुए एक बैल
को देखा ॥६४॥
तब वह उस बैल के पास आकर और उससे बातचीत करके सिंह के पास लौट आया
और उसे उसने वास्तविक समाचार दिया ॥६५॥
'यदि तूने बड़े साँड़ को देखा है और उससे बातचीत की है तो उसे युक्तिपूर्वक समझा
बुझाकर यहाँ ले आ। मैं भी देखूँ वह कैसा है ?' ॥६६॥
इस प्रकार कहकर उस प्रसन्न पिंगलक ने दमनक को फिर उस बैल के पास भेजा ॥६७॥
'आओ आओ हमारा प्रसन्न स्वामी मृगराज तुम्हें बुलाता है। दमनक ने जाकर बैल
से इस प्रकार कहा किन्तु उसने भय के कारण विश्वास नहीं किया। तब दमनक ने फिर
से वन में जाकर अपने स्वामी सिंह द्वारा उस बैल को अभयदान दिलाया ॥६८-६९॥
और फिर, बैल के पास जाकर उसे अभयदान द्वारा विश्वास दिलाकर और उसे धीरज
बँधाकर दमनक बैल को सिंह के पास ले आया ॥७०॥
सिंह ने आये हुए और प्रणाम करते हुए बैल से आदर के साथ कहा—'तुम अब यहाँ
मेरे पास निडर होकर रहो' ॥७१॥
'ठीक है' ऐसा कहकर उसके पास आदर से रहते हुए बैल ने धीरे-धीरे सिंह को इस प्रकार
वश में कर लिया कि वह दूसरों से उदासीन हो गया ॥७२॥
तब उपेक्षा के कारण दुःखी दमनक ने एकान्त में करटक से कहा—'देखो संजीवक की
ओर खिंचा हुआ स्वामी अब हम दोनों की उपेक्षा करता है ॥७३॥
शिकार मारकर सब मांस अकेले ही खा जाता है, हम लोगों को नहीं देता। आज यह
मूर्ख सिंह इस बैल से सिखाया जा रहा है ॥७४॥
यह दोष मेरा ही है कि मैं इस बैल को यहाँ लाया। अब मैं ऐसा करूँगा कि यह बैल नष्ट
हो जायगा ॥७५॥
और हमारा स्वामी भी इस अनुचित व्यसन से दूर हो जायगा। दमनक के ये वचन सुनकर
करटक बोला—'मित्र अब यह कार्य तुम भी नहीं कर सकते। उसके ऐसा कहने पर दमनक ने
कहा—'बुद्धि द्वारा अवश्य कर सकता हूँ' ॥७६-७७॥