कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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दशम लम्बक ७३३
एक बार उसकी पत्नी का पिता (श्वशुर) अपने पुत्र (उसके साले) के साथ मालव
देश से उसे निमन्त्रण देने के लिए बड़ी ही उत्सुकता के साथ आया ॥८१॥
तब वयस्यार ने उसका सत्कार करके और उसके द्वारा निमन्त्रित होकर राजा से प्रार्थना
करके (अवकाश लेकर) उसके साथ मालव देश को प्रस्थान किया ॥८२॥
और, वह एक माह तक श्वशुरालय में विश्राम करके राजसेवा के लिए कौशाम्बी लौट
आया किन्तु उसकी स्त्री वहीं रह गई ॥८३॥
कुछ दिन बीतने पर वयस्यार का मित्र क्रोथन अकस्मात् आकर उससे बोला—'तूने अपनी
स्त्री को उसके बाप के घर पर छोड़कर अपने घर का नाश क्यों कर दिया ! वहीं उस पापिन ने
दूसरे पुरुष का साथ कर लिया है ॥८४-८५॥
आज ही उधर से आये हुए एक विश्वस्त व्यक्ति ने मुझसे कहा है। इसे झूठ न समझना।
इसलिए उसे दंड देकर दूसरी स्त्री से विवाह कर लो' ॥८६॥
इस प्रकार कहकर क्रोथन के चले जाने पर कुछ समय तक कर्त्तव्यविमूढ़ होकर वयस्यार
सोचता रहा—'मैं समझता हूँ यह बात सत्य है ॥८७॥
नहीं तो बुलाने के लिए आदमी भेजने पर भी वह क्यों नहीं आई ? इसलिए, उसे लाने
के लिए स्वयं जाता हूँ। देखता हूँ क्या होता है ॥८८॥
इस प्रकार निश्चय करके मालव देश को जाकर और सास-ससुर से आज्ञा लेकर अपनी
स्त्री के साथ वह वहाँ से घर की ओर चला ॥८९॥
दूर मार्ग निकल जाने पर अपने साथी सेवक से बहाना करके विपरीत पथ से स्त्री को लेकर
वह एक घने जंगल में पहुँचा ॥९० ॥
उस बियाबान (भीषण) सूने जंगल में स्त्री को बैठाकर उसने पूछा—'तू पर-पुरुष पर
आसक्त है ऐसा मैंने किसी विश्वासी मित्र से सुना है ॥९१॥
मैंने कौशाम्बी में रहते हुए तुझे लाने के लिए वहाँ से एक दूत भेजा तो भी तू न आई।
इसलिए सब सत्य बता। अन्यथा तेरा नाश कर दूँगा' ॥९२॥
यह सुनकर वह बोली—यदि तुम्हें मेरे चरित्र नष्ट होने का विश्वास ही है तो फिर मुझसे
क्या पूछते हो जो तुम्हें उचित प्रतीत हो वह करो ॥९३॥
इस प्रकार उसके उपेक्षायुक्त वचन सुनकर वयस्यार ने उसे एक वृक्ष से बाँधकर लताओं से
मारना आरम्भ किया ॥ ९४॥
क्रोध में आकर जब उसने उसकी साड़ी खींच ली तब उसे नंगी देखकर वयस्यार का मन
विचलित हो उठा और उस मूर्ख कामी का उससे समागम करने की इच्छा जग उठी ॥ ९५ ॥