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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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पिता का धन, नष्ट करने के बाद उनसे क्या कहोगे और कहाँ जाओगे ? इसलिए यदि
अपना कल्याण चाहते हो तो अब भी यहाँ से निकल चलो' ॥११६॥
उस युवक ने मित्र का कहना न मानकर शेष तीन करोड़ मुद्रा भी व्यय कर
डाली ॥११७॥
सारा धन समाप्त होने पर कुट्टनी मकरकटी ने ईश्वरवर्मा को सेवकों (नौकरों) द्वारा
अर्धचन्द्र (गरदनिया) दिलवाकर निकलवा दिया ॥११८॥
तब अर्थदत्त आदि उसके साथियों ने अपने नगर में जाकर उसके पिता को सम्पूर्ण
समाचार यथावत् सुना दिया ॥११९॥
यह समाचार सुनकर व्यापारियों का चौधरी रत्नवर्मा अत्यन्त दुःखी होकर यमजिह्वा
कुट्टनी के पास आकर बोला- ॥१२० ॥
'तूने इतना धन लेकर मेरे पुत्र को शिक्षा दी और मकरकटी ने सरलता के साथ उससे
पाँच करोड़ मुद्रा ठग ली' ॥१२१॥
इस प्रकार कहकर उसने पुत्र का सम्पूर्ण समाचार उसे सुना दिया। तब उस वृद्धा
कुट्टनी यमजिह्वा ने कहा- ॥१२२॥
'अपने पुत्र को तुम यहाँ बुलवाओ। मैं उसे ऐसी शिक्षा दूँगी कि वह मकरकटी का सारा
धन (सर्वस्व) हरण कर लेगा' ॥१२३॥
कुट्टनी यमजिह्वा के इस प्रकार प्रतिज्ञा करने पर रत्नवर्मा ने पुत्र के हितैषी मित्र
अर्थदत्त को दान आदि का प्रलोभन देकर ईश्वरवर्मा को बुलाने के लिए भेजा ॥१२४ १२५॥
वह अर्थदत्त उस कांचनपुर में जाकर ईश्वरवर्मा से फिर बोला कि 'तूने मेरी बात नहीं
मानी। आज वेश्या का सच्चा प्रेम तूने देख लिया। पाँच करोड़ मुद्रा देकर अर्धचन्द्र पाया।
कौन बुद्धिमान् वेश्या में और बाल में स्नेह (प्रेम और तेल) चाहता है ॥१२६-१२८॥
तुम्हें क्या कहूँ? यह वस्तु का स्वाभाविक धर्म है। चतुर और वीर व्यक्ति तभी तक
सम्मान के भागी होते हैं जबतक स्त्री की विलास-वासना में नहीं पड़ते। इसलिए अब चलो और
अपने पिता के शोक को दूर करो ॥१२९-३१ ॥