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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक १७५
यहाँ उन दोनों का प्रेम गौरी और शंकर के प्रेम से भी अधिक था क्योंकि गौरी
शंकर का आधा (आधाँ) भाग थी किन्तु दमयन्ती तो नल का सर्वस्व ही अर्थात् पूरी
आत्मा थी ॥२८५॥
कुछ समय के अनन्तर दमयन्ती ने नल से पहले चन्द्रसेन नामक पुत्र और उसके उपरान्त
इन्द्रसेन नाम की कन्या को जन्म दिया ॥२८६॥
इतने दिनों तक कलियुग अपनी पूर्व प्रतिज्ञा पर दृढ रहकर शास्त्र-मर्यादा का पालन करने-
वाले नल का छिद्र (दोष) खोजने में लगा रहा ॥२८७॥
कुछ दिनों के अनन्तर एक बार मद्य के नशे की मस्ती में स्मृतिहीन राजा नल बिना सन्ध्या
दिये और बिना पैर धोये ही खाकर सो गया ॥२८८॥
रात-दिन मौका ढूँढ़ते हुए कलि ने यह अच्छा अवसर देखकर नल के शरीर में प्रवेश
किया ॥२८९॥
इस प्रकार कलियुग के अपने शरीर में प्रविष्ट हो जाने से वह नल धार्मिक आचार-विचारों
को छोड़कर मनमाना आचरण करने लगा ॥२९०॥
जैसे जुआ खेलने लगा दासियों के साथ रमण करने लगा झूठ बोलने लगा दिन
में सोने और रात्रि में जागने लगा ॥२९१॥
बिना कारण क्रोध करने लगा अन्याय से धन कमाने लगा सज्जनों का अपमान और दुष्टों
का सम्मान करने लगा ॥२९२॥
ऐसे ही उसके भाई पुष्कर के भी सन्मार्ग का परित्याग करने पर, अवसर पाकर, द्वापर ने
उसके भी शरीर में प्रवेश किया ॥२९३॥
एक बार, नल ने अपने छोटे भाई पुष्कर के घर पर दान्त नाम के सुन्दर श्वेत बैल को
देखा ॥२९४॥
लोभ के कारण उस बैल को माँगते हुए बड़े भाई नल को द्वापर से ग्रसे हुए पुष्कर ने वह
बैल नहीं दिया ॥२९५॥
और बोला—'यदि इस बैल पर तुम्हारी इच्छा है, तो तुम जूए में जीतकर मुझसे इसे
ले लो। देर न करो'। यह सुनकर कलि से ग्रसे हुए नल ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया और उन
दोनों भाइयों का परस्पर जूआ आरम्भ हुआ ॥२९६-२९७॥
पुष्कर की ओर से बैल दाँव पर था और नल की ओर से हाथी-घोड़े आदि दाँव पर लगाये
गये थे। अन्त में पुष्कर जीत गया और नल हार गया ॥२९८॥
इस प्रकार दो-तीन दिनों तक निरन्तर चलते हुए जूए में सारी सेना खजाना आदि
हार जाने पर भी नल ने कलिग्रस्त होने के कारण मना किये जाने पर भी किसी की एक न
मानी ॥२९९॥