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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक १७१
ऐसा कहकर राजा से छोड़े गये उस हंस ने उसी समय विदर्भ देश में जाकर दमयन्ती
से सच्ची बात बता दी और वह इच्छानुसार चला गया ॥२५५॥
नल के लिए उत्कण्ठित दमयन्ती ने माता द्वारा नल की प्राप्ति के लिए पिता से अपना
स्वयंवर कराने की प्रार्थना की ॥२५६॥
राजा ने भी इस बात की स्वीकृति देकर, दमयन्ती के स्वयंवर के लिए, पृथ्वी के सभी
राजाओं के पास दूत भेज दिये ॥२५७॥
दूतों के द्वारा स्वयंवर-समाचार प्राप्त होने पर सभी राजा विदर्भ के प्रति जाने लगे
और उत्कण्ठित नल भी रथ पर सवार होकर विदर्भ के लिए चला ॥२५८॥
तदनन्तर, नल-दमयन्ती के प्रेम-स्वयंवर का समाचार इन्द्र आदि सभी लोकपालों ने
नारद मुनि से सुना। यह सुनकर इन्द्र वायु यम आदि बहल पाँचों लोकपाल आपस में सम्मति
करके नल के पास गये ॥२५९-२६०॥
और, विदर्भ को जाते हुए विप्रलम्भ नल से मार्ग में ही मिलकर वे बोले— तुम हमारी
ओर से हमारे सन्देश दमयन्ती को जाकर सुना दो ॥२६१॥
कि तू हम पाँचों में से किसी एक लोकपाल को वर ले। मानव नल से तुझे क्या सुख
मिलेगा ? क्योंकि मनुष्य मरणधर्मा होते हैं और देवता अमर हैं ॥२६२॥
और तू हमारे वरदान से अदृश्य होकर उसके पास जा सकेगा। दूसरे व्यक्ति तुझे न
देख सकेंगे। नल ने देवताओं की इस आज्ञा को 'ठीक है' कहकर मान लिया ॥२६३॥
और, दमयन्ती के भवन में अदृश्य रूप से जाकर उसे देवताओं का सन्देश उसी प्रकार उसने
सुना दिया ॥२६४॥
यह सुनकर वह पतिव्रता बोली—'वह देवता भले ही अमर हों मेरा पति तो नल ही
होगा। मुझे देवताओं से क्या प्रयोजन ? ॥२६५॥
दमयन्ती का यह उत्तर सुनकर नल ने उसके सामने अपने को प्रकट कर दिया फिर
जाकर इन्द्र आदि लोकपालों से उसका उत्तर उसी प्रकार कह दिया ॥२६६॥
तब प्रसन्न देवताओं ने नल से कहा—हे सत्यवादी हमलोग तेरे वश में हैं। तू जब भी
हमें स्मरण करेगा तभी हम तेरे समीप आयेंगे। इस प्रकार का वर उसे देकर वे देवता
चले गये ॥२६७॥
तब नल के प्रसन्न होकर विदर्भ की ओर चले जाने पर दमयन्ती को ठगने की इच्छा से
देवताओं ने नल का रूप धारण कर लिया ॥२६८॥
और राजा भीम की सभा में जाकर मनुष्यों का-सा व्यवहार करनेवाले वे देवता स्वयंवर
प्रारम्भ होने पर, नल के पास ही बैठ गये ॥२६९॥