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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक १३५
कुछ समय बाद वह राजा विदर्भदेश-स्थित कुण्डिनपुर नामक समृद्ध नगर में श्वशुर
गृह को पहुँचा। वहाँ श्वशुर द्वारा सत्कार प्राप्त कर स्त्री और पुत्र के साथ कुछ दिनों तक वह
वहीं ठहर गया ॥२३४॥
तदनन्तर, वहाँ से धीरे-धीरे चलकर स्त्री मदनसुन्दरी और पुत्र हिरण्यवर्म के साथ
प्रजाओं के लिए मूर्तिमान् उत्सव के समान और प्रसन्नचित्त वह राजा अपनी राजधानी कनकपुर
में पहुँचा ॥२३५-२३६॥
वहाँ पहुँचकर प्रसन्न प्रजाओं का अभिनन्दन स्वीकार कर राजा कनकवर्म ने रानी मदन-
सुन्दरी का पट्टबन्धन करके उसे सभी रानियों में प्रमुख अर्थात् महारानी बना दिया ॥२३७॥
तदनन्तर राजा कनकवर्म महारानी और पुत्र के साथ प्रतिदिन उत्सव मनाता हुआ सदा
के लिए विद्यारस भुक्त होकर, अपने निष्कण्टक सर्वभोग्य राज्य का पालन करने लगा ॥२३८॥
अलंकारवती के साथ नरवाहनदत्त अपने मुख्य मंत्री गोमुख से इस प्रकार की मनोरंजक
कथा को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥२३९॥
महाकवि श्री सोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का
पञ्चम तरंग समाप्त
षष्ठ तरंग
तदनन्तर गोमुख द्वारा कही गई कथा के सुनने से सन्तुष्ट राजा नरवाहनदत्त ने
मरुभूतिक आदि मन्त्रियों को कुछ कुण्ठित-सा देखकर उसे प्रसन्न करते हुए कहा-हे मरुभूति
तुम भी एक कथा जरा सही कहो ॥१-२॥
तब मरुभूति ने 'बहुत अच्छा कहता हूँ'—इस प्रकार उत्तर देकर कथा आरम्भ
की ॥३॥