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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ४७
सुन्दर कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए और कंगन के शब्द को सुनते हुए निश्चयदत्त ने
पीछे हाथ घुमाकर उसके हाथ को पकड़ लिया ॥१७॥
उसके हाथ पकड़ने पर वह अदृश्य विद्याधरी खम्भे के भीतर से बोली— हे महाभाग !
मैंने तेरा कौन-सा अपराध किया है कि मेरा हाथ पकड़ रखा है। इसे छोड़ो' ॥१८॥
वैश्य पुत्र ने कहा— 'मेरे सामने आकर बताओ कि तुम कौन हो तब तुम्हारा हाथ
छोड़ूँगा। विद्याधरी ने शपथ खाकर कहा कि मैं प्रत्यक्ष होकर तुम्हें सब कहूँगी। उसके ऐसा
कहने पर उसने हाथ छोड़ दिया ॥१९ २ ॥
तदनन्तर वह सर्वांगसुन्दरी विद्याधरी वैश्य-पुत्र के मुख पर आँखें गड़ाए हुए, बैठकर
बोली—॥२१॥
'हिमालय पर्वत के शिखर पर पुष्करावती नाम की नगरी है। वहाँ विन्ध्यपर नाम का
विद्याधरों का राजा है ॥२२॥
उनकी मैं अनुरागपरा नाम की कन्या हूँ। यहाँ महाकाल भगवान् की पूजा के लिए
आई थी। इस खम्भे में कुछ देर के लिए विश्राम कर रही हूँ ॥२३॥
तबतक कामदेव के मोहन-मन्त्र के समान यहाँ आकर चन्दन को शरीर में घिसते हुए
तुम्हें देखा ॥२४॥
तुम्हारी पीठ पर चन्दन का लेप करती हुई मेरा हाथ तुमने प्रथम अनुराग के समान पकड़ा।
अब मैं जाती हूँ। उस कन्या के इस प्रकार कहने पर वैश्य-पुत्र ने कहा—'अब मुझे तुम्हारे पिता का
स्थान मालूम हो गया है। अभी तक तुम से हरण किये गये अपने हृदय को मैंने वापस नहीं लिया
है। लिय हुए हृदय के बिना वापस किय तुम कैसे जाओगी ? ॥२५-२७॥
उससे इस प्रकार कही गई और स्वस्थ प्रेम के वशीभूत वह विद्याधरी बोली— यदि
तुम मेरी नगरी में आ जाओगे तो फिर मिलूँगी ॥२८॥
किन्तु हे नाथ ! वह नगरी अत्यन्त दुर्गम है इसलिए तुम्हारी अभिलाषा पूरी न हो
सकेगी। फिर भी उद्योगी पुरुषों के लिए दुष्कर क्या है ? ऐसा कहकर वह अनुरागपरा
आकाश-मार्ग से उड़कर चली गई निश्चयदत्त भी उमीप हृदय को लगाये हुए भवन पर लौट
आया ॥३ ॥