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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 630

नवम लम्बक ५८३
हाथ में उस कंठहार को लिये हुए वह क्रमशः कलशपुर नामक नगर में पहुँचा और
वहाँ एक यक्ष-मन्दिर में गया ॥१०८॥
पानी में तैरते-तैरते थका हुआ वह बनिया भाग्यवश वहाँ अच्छी छाया पाकर धीरे-धीरे
सो गया ॥१०९॥
उसके सोते हुए में ही नगर के पहरेदार अकस्मात् उधर जा निकले और उन्होंने उसके
हाथ में खुले हुए उस हार को चमकते देखा ॥११० ॥
'यह हार हमारी राजकुमारी चन्द्रसेना का है। इसने ही उसके गले से झपट लिया है
इसलिए यह अवश्य चोर है' ॥१११॥
ऐसा कहकर वे पहरेदार उसे जगाकर राजा के पास ले गये। वहाँ राजा के उससे
पूछने पर उसने सब सत्य समाचार राजा से कह दिया ॥११२॥
'यह चोर है झूठ बोलता है।' ऐसा कहकर और हार को फैलाकर राजा ने सभासदों को
दिखलाया ॥११३॥
कान्ति से चमकते हुए उस हार को आकाश में उड़ते हुए एक गीध ने देखा और राजा के
हाथ से उसे झपटकर वह आकाश में उड़ गया तथा अदृश्य हो गया ॥११४॥
तदनन्तर अत्यन्त भीत उस वैश्य के शिव के नाम लेकर चिल्लाहट मचाने पर, राजा ने
क्रुद्ध होकर उसके वध का आदेश दे दिया किन्तु इतने में ही आकाशवाणी हुई—॥११५॥
'हे राजन् इसे मत मारो। यह सज्जन बनिया समुद्रशूर तुम्हारे देश में व्यापार करने
आया है॥११६॥
हार को जिस चोर ने चुराया था वह सिपाहियों के डर से घबराया हुआ रात को समुद्र
में डूब गया। वह बनिया नाव के टूट जाने पर उसी चोर के शव पर बैठकर हाथों से समुद्र पार करके
यहाँ आया है। उस शव की कमर में बँधी हुई धोती की गाँठ से बनिया ने यह हार पाया है। अतः
इसने यह हार तुम्हारे घर से नहीं लिया है ॥११७–११९॥
इसलिए, यह चोर नहीं है। हे राजन् इस धार्मिक वैश्य को छोड़ दो और सम्मानित
करके इसे विदा करो। इतना कहकर आकाशवाणी बन्द हो गई ॥१२० ॥
यह सुनकर सन्तुष्ट हुए राजा ने उसे छोड़ दिया और धन से सम्मानित करके उसे विदा
किया। उस वैश्य समुद्रशूर ने भी उस धन से व्यापार का सामान लेकर स्ववश आते हुए उस
भयंकर महासमुद्र को पार किया॥१२१ १२२॥