कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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राज्य और धन का दान करके राजा ने रोते हुए नागरिकों के सामने ही तपोवन में जाने
की इच्छा से श्वेतरश्मि हाथी को बुलाया ॥११० ॥
सामने प्रस्तुत श्वेतरश्मि हाथी ने तुरन्त अपना हाथी का शरीर छोड़कर हार-केयूर
धारी दिव्य पुरुष गन्धर्व का रूप धारण किया ॥१११॥
श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा
'तुम कौन हो और यह क्या किया ? —राजा के इस प्रकार पूछने पर हाथी बोला—
मैं और तुम—हम दोनों पूर्वजन्म में मलयाचल-निवासी गन्धर्वजातीय भाई हैं। मैं छोटा
भाई सोमप्रभ हूँ और दूसरा बड़ा भाई देवप्रभ था । उसकी राजवती नाम की अत्यन्त
प्यारी पत्नी थी जिसे वह गोद में लेकर घूमते हुए सिद्धवास नामक स्थान में मेरे साथ
गया ॥११२–११४॥
वहीं पर विष्णु भगवान् के एक मन्दिर में उनकी पूजा करके हम लोग गाने के लिए
प्रवृत्त हुए ॥११५॥
उस मन्दिर में एक सिद्ध आया और वह अतिमनोहर गान करते हुए राजवती को एकटक
से देखने लगा ॥११६॥
मेरे बड़े भाई ने उसे इस प्रकार घूरते हुए देखकर उस सिद्ध से क्रुद्ध होकर कहा कि तू
सिद्ध होकर भी दूसरे की स्त्री को इस प्रकार की लालसा से क्यों देखता है ? ॥११७॥
तब सिद्ध ने भी क्रुद्ध होकर उसे शाप देने के लिए इस प्रकार कहा—'रे मूर्ख ! गाने के
आश्चर्य से मैंने इसे देखा वासना से नहीं। इसलिए, हे ईर्ष्याभासे ! तुम दोनों इसके साथ मनुष्य
की योनि में जा गिरागे और तुम इसी पत्नी को दूसरे से समागम करते हुए अपनी आँखों से
देखोगे' । ऐसा कहते हुए उस सिद्ध को मैंने क्रोध से हाथ में लिये हुए मिट्टी के सफेद हाथी
(खिलौने) से मारा ॥११८–१२०॥
तब उसने मुझे शाप दिया कि 'तूने मुझे मिट्टी के सफेद हाथी से मारा है इसलिए तू अगले
जन्म में सफेद हाथी की योनि में जन्म लेगा' ॥१२१॥
तदनन्तर मेरे भाई द्वारा किये गये अनुनय-विनय पर प्रसन्न उस सिद्ध ने दयालु होकर
हम दोनों का शापान्त इस प्रकार किया ॥१२२॥
देवप्रभ से कहा कि 'तू विष्णु भगवान् की कृपा से मनुष्य होकर भी एक द्वीप का राजा
होगा और हाथी बने हुए अपने भाई को दिव्य वाहन के रूप में प्राप्त करेगा। तेरी अस्सी
हजार रानियाँ होगी। उन सभी रानियों की दुश्चरित्रता तुझे जनता के सामने मालूम
होगी ॥१२३ १२४॥
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