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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 570

नवम लम्बक ५२१
तट पर तख्ते से उतरा हुआ हिरण्यगुप्त अपनी प्रेयसी अनंगप्रभा के दुःख से दुखित होकर
इस घटना को अवश्यम्भावी दैवयोग समझने लगा ॥१३२॥
इस प्रकार धीरे-धीरे चलकर वह धैर्यशाली वैश्य अपने नगर को जाकर धीरज बाँधकर
निश्चिन्तता पूर्वक व्यापार से धन कमाने लगा ॥१३३॥
आश्चर्य यह है कि तख्तों पर बैठी हुई उस अनंगप्रभा को सागरवीर ने एक ही दिन में
समुद्र के तट पर पहुँचा दिया ॥१३४॥
तट पर पहुँचकर सागरवीर द्वारा धीरज बँधाई गई अनंगप्रभा को उसने सागरपुर
में अपने घर पहुँचा दिया ॥१३५॥
वहाँ पर राजा के समान सम्पत्तिवाले वीर, प्राण देनेवाले युवक और सुन्दर सागरवीर
को अपना आज्ञाकारी समझकर दासों (धीवरों) के सरदार को ही उस अनंगप्रभा ने अपना पति
बना लिया। सच है चरित्रहीन स्त्री नीच-ऊँच का विचार नहीं करती ॥१३६-१३७॥
तब वह अनंगप्रभा उसी दासों के राजा के साथ उसके ही घर में उसकी धन-सम्पत्ति का
उपभोग करती हुई रहने लगी ॥१३८॥
एक बार उस अनंगप्रभा ने अपने ऊँचे महल की छत से किसी गली से जाते हुए
विजयवर्मा नामक सुन्दर राजपूत को देखा ॥१३९॥
उसके सुन्दर रूप के लोभ से वह अनंगप्रभा छत से उतरकर और उसके पास जाकर
उससे कहने लगी कि तुम्हारे रूप को देखते ही मेरा चित्त तुम्हारी ओर खिंच गया है।
इसलिए, तुम मेरा उपभोग करो ॥१४०॥
उसने उसका प्रस्ताव स्वीकार किया और आकाश से गिरी हुई उस त्रैलोक्यसुन्दरी को
लेकर वह अपने घर चला गया ॥१४१॥
उसके भाग जाने पर वह सागरवीर उसे भागी हुई समझकर और सब कुछ त्याग कर
तपस्या द्वारा शरीर छोड़ने के लिए गंगा के तट पर चला गया। भला यह दुःख उसे क्यों नहीं
होता क्योंकि कहाँ वह बेचारा धीवर और कहाँ दिव्य रूपवाली उस विद्याधरी का
समागम ॥१४२-१४३॥
वह अनंगप्रभा भी उस विजयवर्मा के साथ स्वच्छन्द रूप से उसी नगर में रहने
लगी ॥१४४॥
किसी समय हस्तिनी पर चढ़ा हुआ उस नगर का राजा मलयवर्मा नगर में घूमने के लिए
निकला ॥१४५॥
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