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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ३७
स्वर्णद्वीप जाते हुए उस दयालु बनिये ने मरने से रोककर और जीवन-निर्वाह का प्रबन्ध
करके मुझे जहाज पर चढ़ा दिया ॥८०॥
तब समुद्र के बीच जहाज से जाते हुए हम लोगों को पाँच दिन बीत गये छठे दिन
अकस्मात् बादल दीख पड़े और मूसलाधार पानी बरसने पर आँधी से जहाज हाथी के सिर
के समान झूमने लगा। और क्षण-भर में टूटकर डूब गया । डूबते हुए मैंने एक लकड़ी का
तख्ता पा लिया ॥८१-८३॥
उस पर बैठा हुआ मै आकाश साफ होने पर, इस द्वीप के किनारे वन में जा लगा। वहाँ
से इस चौसाले मकान को देखकर इधर आया और यहाँ आँख के लिए अमृत-वर्षा के समान
दुःख शमन करनेवाली तुम्हें देखा ॥८४-८५॥
ऐसा कहते हुए उस बनिये को मद और काम से उन्मत्त राजदत्ता ने पलंग पर बैठाकर
लिपटा लिया ॥८६॥
स्त्रीत्व मद का नशा एकान्त पुरुष का मिलना और पूर्ण स्वतन्त्रता जहाँ ये पाँच
अनियाँ एकत्र हों वहाँ चरित्र-रूपी तृण की बात ही क्या ? ॥८७॥
काम से उत्तेजित नारी किसी प्रकार का विचार नहीं कर सकती। इसीलिए उसने
विपत्ति में पड़े हुए उस दरिद्र और कुरूप को भी अपना किया ॥८८॥
इतने में ही वह राजा रत्नाधिपति उत्सुकता के साथ आकाशगामी हाथी पर बैठकर
शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचा ॥८९॥
उसने आते ही उस दीन दरिद्र के साथ सोयी हुई रानी राजदत्ता को अपनी आँखों से
देखा ॥९०॥
उसने मार डालने योग्य व्यक्ति को भी दीनतापूर्वक प्रार्थना करने पर नहीं मारा।
डरी हुई और मद्य से चूर पत्नी को देखकर वह इस प्रकार सोचने लगा कि काम का एकमात्र
मित्र मद्य के पी लेने पर स्त्री सती कैसे रह सकती है? ॥९१ ९२॥
चंचला (दुराचारिणी) स्त्री रक्षा से भी रोकी नहीं जा सकती। क्या प्रलयकालीन आँधी
हाथ से रोकी जा सकती है ? ॥९३॥
मैंने जो गणक का कहना नहीं माना उसी का यह फल है। विश्वस्त और हितैषी
पुरुष की बात का अनादर करना किसके लिए परिणाम में अच्छा नहीं होता ॥९४॥