कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 486 of 1079
Read in context[Header]
अष्टम लम्बक ४४९
उसी अवसर पर भगवती गौरी के साथ शंकर भी वहाँ उपस्थित हुए और सभी देव
असुर, दानव तथा विद्याधर आदि राजाओं ने उनके चरणों में सादर प्रणाम किया ॥२४॥
तदनन्तर, सभी देव दानव और विद्याधरों के पुण्याहवाचन का पाठ करने पर
समस्त ऋषिगण तथा प्रभास आदि से लाये गये जलों से विधिपूर्वक सिंहासन पर बैठे हुए
सूर्यप्रभ का विद्याधर चक्रवर्ती पद पर अभिषेक किया मुकुट और पट्ट-बन्धन किया। उस
समय आकाश में वाद्यों के साथ देवताओं की दुन्दुभियां बज उठीं और सुन्दरी अप्सराएं
नाचने लगीं॥२५-२६॥
तब महर्षियों के समूह ने कामचूड़ामणि का भी अभिषेक किया और उसे सूर्यप्रभ की
महिषी (वैमानिक महारानी) बनाया ॥२७॥
अभिषेक-महोत्सव के सम्पन्न होने के पश्चात् देवताओं और असुरों ने अपने-अपने
स्थानों को लौट जाने पर सूर्यप्रभ ने अपने बन्धुओं और मित्रों के साथ और कुछ दिनों तक
अभिषेकोत्सव को बढ़ाया ॥२८॥
तदुपरान्त कुछ दिनों के पश्चात् उत्तर की वेदी का आधा राज्य शिवजी के
आज्ञानुसार श्रुतशर्मा को देकर तथा अन्य पत्नियों को प्राप्त कर सूर्यप्रभ ने अपने मित्रों के
साथ चिरकाल तक विद्याधर राज्य की लक्ष्मी का उपभोग किया ॥२९॥
इस प्रकार शिवजी की कृपा से मनुष्य होते हुए भी सूर्यप्रभ ने विद्याधरों की राज्य
लक्ष्मी प्राप्त की ॥३०॥
इस क्रम से विद्याधर-श्रेष्ठ वयत्रज वत्सराज के सम्मुख सूर्यप्रभ की कथा सुनाकर
और नरवाहनदत्त को प्रणाम करके आकाश में उड़ गया ॥३१॥
उसके चले जाने पर युवराज नरवाहनदत्त अपनी पटरानी मदनमञ्चुका के साथ विद्या
धर चक्रवर्ती बनने की उत्सुकता लिये हुए पिता वत्सराज के गृह में निवास करने लगा ॥३२॥
सूर्यप्रभ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त।
सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक भी समाप्त
इति महाकविश्रीयोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर में
[Footer]
५७