Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 48 of 1079

Read in context
Page 48

सप्तम लम्बक २१
उस आये हुए हाथी पर विष्णु भगवान के आज्ञानुसार चढ़कर राजा न सारी पृथ्वी को
जीतकर राज-कन्याओं का आहरण किया ॥२ ॥
वह राजा अस्सी हजार कन्याओं को लाकर रत्नकूटपुर में यथेच्छ विहार करता हुआ
रहने लगा ॥२१॥
और उस श्वेतरश्मि¹ हाथी की शान्ति के लिए प्रतिदिन पाँच सौ ब्राह्मणों को भोजन
कराता था ॥२२॥
किसी समय उस हाथी पर चढ़कर और अनेक द्वीपों का भ्रमण करके वह राजा अपम द्वीप
में आया। वहाँ पर आकाश से भूमि पर उतरते हुए उस हाथी के मस्तक पर गरुडजातीय पक्षी ने
चोंच से प्रहार किया ॥२३-२४॥
राजा के तीखे अंकुश के प्रहार से वह पक्षी तो भाग गया किन्तु हाथी चोंच की मार
से मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥२५॥
राजा के उतर जाने पर होश में आया हुआ भी वह हाथी उठाये जाने पर भी न उठ
सका और न आहार कर सका ॥२६॥
इस प्रकार, पाँच दिनों तक उस हाथी के निराहार पड़े रहने पर राजा भी निराहार रहकर
दुःखित हुआ और बड़ी चिन्ता में पड़कर बोला—'हे लोकपालो मुझे इस संकट में कोई उपाय
बताओ। नहीं तो मैं अपना सिर काटकर तुम्हें बलि दे दूँगा' ॥२७-२८॥
ऐसा कहकर और तलवार खींचकर अपना गला काटने को तैयार राजा से आकाशवाणी ने
अशरीर रूप से कहा—॥२९॥
'हे राजन् ! ऐसा दुस्साहस कार्य न करो। यदि कोई पतिव्रता स्त्री अपने हाथ से इस
हाथी का स्पर्श करेगी तो यह उठ जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है' ॥३ ॥
यह सुनकर प्रसन्न राजा ने अमृतलता नाम की सुरक्षित प्रधान रानी को बुलवाया ॥३१॥
जब उसके छूने पर हाथी नहीं उठा तब उसने अन्य सभी रानियों को बुलवाया ॥३२॥
उनके छूने पर भी जब हाथी न उठा तब यह निश्चय हो गया कि इनमें कोई भी
सच्चरित्रा और पतिव्रता नहीं है ॥३३॥
१ किसी-किसी पुस्तक में हाथी का नाम 'शीतरश्मि' मिला है। किन्तु श्वेतरश्मि'
नाम ही उचित प्रतीत होता है।—अनु.