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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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षष्ठम लम्बक ४१७
तीर्थ-यात्रा तुम्हें अभीष्ट है, किन्तु विद्वानों के कथनानुसार तीर्थ-यात्रा उसके लिए
उचित है, जिसके पास वैदिक कर्म करने के लिए प्रचुर सम्पत्ति नहीं है ॥२२४॥
अन्यथा देवता, पितर, अग्नि की सेवा, व्रत एवं जप आदि से घर बैठे जो पुण्य की प्राप्ति
हो सकती है, वह मार्ग में भटकनेवाले तीर्थयात्रियों को नहीं ॥२२५॥
भुजाओं की तकिया लगाये भूमि पर सोनेवाला, भिक्षाओं से भोजन प्राप्त करनेवाला,
अकेला और दीन यात्री मुनियों की समता पाकर भी कष्टों से छुटकारा नहीं पाता ॥२२६॥
देह-त्याग से तुम जो सुख चाहते हो, वह तुम्हारी भूल है। आत्मघाती को परलोक में भी
अत्यधिक कष्ट उठाने पड़ते हैं ॥२२७॥
अतः युवा और विद्वान् तुम्हारा यह निरा मोह है। स्वयं सोचो और मेरी बात
मानो ॥२२८॥
मैं तुम्हारे लिए विशाल विस्तृत भू-गृह बनवा देता हूँ। तुम सुन्दरी से विवाह करके वहाँ
अज्ञात रूप से रहो, जैसा तुम चाहते हो ॥२२९॥
अग्निदत्त द्वारा इस प्रकार समझाये गये गुणशर्मा ने उसकी बात मान ली और उससे
कहा कि मैंने तुम्हारी बात मान ली। सुन्दरी जैसी पत्नी को कौन छोड़ सकता है। किन्तु असफल
अवस्था में मैं तुम्हारी कन्या से विवाह न करूँगा। तबतक संयत स्थिति में रहकर किसी देवता की
आराधना करता हूँ। जिससे उस कृतघ्न राजा से बदला ले सकूँ ॥२३०-२३२॥
प्रसन्न चित्त अग्निदत्त ने उसकी बात मान ली और गुणशर्मा ने भी उसके घर में रात्रि को
सुखपूर्वक विश्राम किया ॥२३३॥
दूसरे ही दिन अग्निदत्त ने गुणशर्मा की सुविधा के लिए रक्षायुक्त और आवश्यकताओं
से परिपूर्ण 'पाताल-वसति' नामक भू-गृह बनवाया ॥२३४॥
उस गृह में रहते हुए एक बार गुणशर्मा ने अग्निदत्त से एकान्त में कहा- यह बताइए
कि मैं यहाँ रहकर किस देवता की भक्ति और व्रत विधानानुसार आराधना करूँ? ऐसा कहते हुए
धैर्यशाली गुणशर्मा से अग्निदत्त ने कहा-'मैं गुरु द्वारा दीक्षा में प्राप्त स्वामी कार्तिक का
मन्त्र जानता हूँ। उस मन्त्र से तुम तारक (तारकासुर)-निहन्ता देवसेनापति (कार्तिकेय)
की आराधना करो ॥२३५-२३७॥
जिन कार्तिकेय के जन्म को चाहनेवाले असुरों से पीड़ित देवताओं द्वारा भेजे गये
कामदेव को शिव ने दग्ध करके भी सफलप्रयत्न बना दिया ॥२३८॥
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