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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक ४११
उस समय पहले संन्यासी की सिद्ध की गई यक्षिणी ही दिव्य उपचारों से उसकी सेवा
करती रही ॥१७९॥
तब सेवा से सन्तुष्ट महन्त ने आदित्यशर्मा को सुलोचना की सिद्धि का मन्त्र और उसका
विधान बता दिया ॥१८०॥
आदित्यशर्मा ने भी मंत्र प्राप्त करके और उसका नियमित जप समाप्त करके एकान्त में
जाकर विधिपूर्वक हवन किया ॥१८१॥
तदनन्तर, जगत् के लिए आश्चर्यजनक रूपवाली सुलोचना यक्षिणी विमान पर बैठकर
उसके सामने प्रकट हुई ॥१८२॥
और उससे बोली-'आओ आओ। मैं तुम्हें सिद्ध हो गई हूँ किन्तु छह महीनों तक
तू मेरा कन्याभाव नष्ट न करना ॥१८३॥
यदि तुम मुझसे महावीर, सम्पत्तिशाली सुन्दर कंचनमाला सर्वज्ञ और अजेय पुत्र
प्राप्त करना चाहते हो' ॥१८४॥
'ऐसा ही करूँगा'—कहते हुए उस आदित्यशर्मा को वह यक्षिणी विमान द्वारा अलका नगरी
को ले गई ॥१८५॥
तदनन्तर, वह आदित्यशर्मा छह महीनों तक पास में बैठी हुई उसको देखते हुए नियमा-
नुसार असिधारा-व्रत करता रहा ॥१८६॥
उसके ब्रह्मचर्य-व्रत से सन्तुष्ट होकर कुबेर ने विधिपूर्वक वह सुलोचना यक्षिणी
आदित्यशर्मा को दान कर दी ॥१८७॥
तब उसी सुलोचना यक्षिणी के गर्भ में उस ब्राह्मण द्वारा मैं उत्पन्न हुआ और मेरे पिता ने
मेरे सद्गुणों के कारण मेरा नाम गुणशर्मा रख दिया ॥१८८॥
तब बड़ा होकर मैंने अलका नगरी में ही यक्षों के सरदार मनिभद्र से समग्र वेदों,
अन्यान्य विद्याओं और कलाओं का अध्ययन किया ॥१८९॥
एकबार किसी कार्य के लिए इन्द्र कुबेर के पास आया। उसे देखकर जो भी बैठे थे उठ
खड़े हुए ॥१९०॥
किन्तु वहाँ बैठे हुए मेरे पिता आदित्यशर्मा अन्यमनस्कता के कारण कुछ सोचते रह
गये वे सम्मान के समय उठे नहीं ॥१९१॥
इस कारण क्रोध करके इन्द्र ने कहा—'रे जड़ तू अपने मर्त्यलोक में ही जा। तू यहाँ
रहने योग्य नहीं है' ॥१९२॥
तब माता सुलोचना की करुण प्रार्थना करने पर इन्द्र ने कहा-यदि ऐसा है, तो यह न
जाये इसका पुत्र ही जाय—॥१९३॥