Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 432 of 1079

Read in context
Page 432

अष्टम लम्बक १९७
गुणशर्मा राजा को इस प्रकार आश्वासन देकर और आँखों में अन्तर्धान होने का अंजन
लगाकर रात्रि के समय अदृश्य होकर विक्रमशक्ति के शिविर में गया ॥७४॥
वह उसके निजी भवन में आकर और सोये हुए विक्रमशक्ति को जगाकर बोला-'मैं देव-
दूत हूँ और तुम्हारे पास आया हूँ ॥७५॥
तुम महासेन के साथ सन्धि करके शीघ्र ही यहाँ से हट जाओ नहीं तो निश्चित रूप से
तुम्हारा नाश होगा। तुम्हारे दूत भेजने पर वह सन्धि स्वीकार कर लेगा ऐसा सन्देश देकर
विष्णु ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है ॥७६-७७॥
क्योंकि तू विष्णु का भक्त है और वे भक्तों से प्यार करते हैं तथा उनके योग-क्षेम का
ध्यान रखते हैं। यह सुनकर राजा विक्रमशक्ति ने सोचा-॥७८॥
इस देवदूत का कथन अवश्य ही सत्य है। अन्यथा कठिनता से भी यहाँ किसी का प्रवेश
असम्भव है। उसका स्वरूप भी मनुष्यों का-सा नहीं है ॥७९॥
ऐसा सोचकर राजा बोला- मैं धन्य हूँ जिसे भगवान् विष्णु ने ऐसा सन्देश दिया है।
मैं उनके आदेश का पालन करता हूँ ॥८०॥
ऐसा कहते हुए राजा पर विश्वास करके गुणशर्मा अंजन के प्रभाव से अदृश्य हो
गया ॥८१॥
और उसने जो कुछ किया था वह महासेन से आकर कह सुनाया। महासेन ने प्राण और
राज्य देनेवाले गुणशर्मा को गले से लगा लिया ॥८२॥
प्रातःकाल ही विक्रमशक्ति दूत भेजकर और महासेन के साथ सन्धि करके सेना के साथ
शीघ्र ही लौट गया ॥८३॥
महासेन भी राजा गोमन्द को जीतकर गुणशर्मा के प्रभाव से हाथी और घोड़े प्राप्त करके
अपनी राजधानी में लौट आया ॥८४॥
उज्जयिनी में रहते हुए महासेन को नदी में स्नान करते समय ग्राह से और उद्यान में
भ्रमण करते समय सर्प के काटने से गुणशर्मा ने बचाया ॥८५॥
कुछ दिनों के बीतने पर, अपनी सेना को प्रबल बनाकर महासेन ने राजा विक्रमशक्ति
पर आक्रमण कर दिया ॥८६॥
विक्रमशक्ति भी उसे आया जानकर युद्ध के लिए बाहर निकल आया और दोनों में परस्पर
भयानक युद्ध हुआ। ८७॥
युद्ध में वे दोनों राजा रथरहित होकर पैदल ही द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥८८॥