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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 372

अष्टम लम्बक ३४१

कामचूडामणि तू और सुप्रभा एक ही गोत्र में उत्पन्न हुई हो। इसने इन्हीं
दिनों में सुप्रभा का विवाह किया है। तो क्या युद्ध में इसका कल्याण नहीं होगा।
सिद्धों की वाणी व्यर्थ नहीं जाती। फिर, सुप्रभा ने इसका चित्त-हरण किया है, तो उससे
इसका क्या ? ॥१८४-१८७॥
क्या तू इसका चित्त हरण नहीं कर सकती ? क्योंकि तू रूप में उससे अधिक सुन्दरी है।
अपने बन्धु-बान्धवों के कारण यदि तुझे सन्देह है, तो यह ठीक नहीं ॥१८५॥
सती स्त्रियों का पति के सिवाय और कोई बन्धु नहीं है। सखी की यह बात सुनकर
वह सुन्दरी कन्या बोली—॥१८६॥
'हे सखि तूने सच कहा। मुझे अन्याय्य बन्धु-बान्धवों से क्या प्रयोजन ? मैं अपनी विद्या
के प्रभाव से जान रही हूँ कि युद्ध में आर्यपुत्र की जीत होगी ॥१८७॥
उसे विद्याधर-चक्रवर्ती होने के कारणभूत सभी रत्न सिद्ध हो चुके हैं और विद्याएँ भी सिद्ध
हो गई हैं, किन्तु ओषधियाँ उसे अभी सिद्ध नहीं हुई हैं। इससे मन कुछ व्याकुल है ॥१८८॥
वे सभी ओषधियाँ चन्द्रपाद नामक पर्वत पर गुफा के अन्दर रखी हैं। वे ओषधियाँ किसी
पुण्यात्मा चक्रवर्ती को ही सिद्ध होती हैं ॥१८९॥
यदि यह अभी जाकर उन सब ओषधियों को सिद्ध करे, तो इसका कल्याण हो। क्योंकि
प्रातःकाल ही इसका युद्ध प्रारम्भ होगा' ॥१९०॥
यह सुनकर, जान-बूझकर सोया हुआ सूर्यप्रभ उठकर उस कन्या से नम्रता के साथ
बोला—'हे सुलोचने तून मुझपर अत्यधिक पक्षपात प्रकट किया है। इसलिए मैं अभी वहीं
(चन्द्रपाद गिरि पर) जाता हूँ। अब सुबता कि कौन है? ॥१९१-१९२॥
उसकी बातें सुनकर वह कन्या इसलिए लजा गई कि सूर्यप्रभ ने उसकी सारी बातें
सुन लीं। अतः वह चुप हो गई। तब उसकी सखी ने सूर्यप्रभ से कहा—॥१९३॥
'यह विद्याधरों के राजा सुमेरु के छोटे भाई की कन्या विलासिनी है। तुम्हें देखने को
बहुत उत्सुकता थी' ॥१९४॥
वह विलासिनी इस प्रकार कहती हुई सहेली को 'आओ चलें' कहकर वहाँ से चली
गई ॥१९५॥
तब सूर्यप्रभ ने प्रभास आदि मन्त्रियों को जगाकर ओषधियों की सिद्धि की चर्चा उनसे
की ॥१९६॥
और, इनकी सिद्धि के लिए योग्य प्रहस्त को सुमेरु, मय और सुनीथ के समीप
भेजा ॥१९७॥