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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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'हंस पद्मवन में तभी तक निश्चिन्तता से बोलते हैं, जबतक आकाश को ढकनेवाले
मेघ उन्हें नहीं दीखते ॥१६९॥
वज्रप्रभ के साथ ऐसा कहकर और उठकर मैं चला आया। प्रहस्त द्वारा यह समाचार
सुनकर मय आदि ने सन्तोष प्रकट किया ॥१७०॥
तदनन्तर, युद्ध की तैयारी का निश्चय करके सूर्यप्रभ आदि ने युद्ध में पूर्वम प्रभास को
सेनापति बनाया ॥१७१॥
अन्य सभी सुवासकुमार से आज्ञा लेकर उस दिन नियम के साथ (विधि-पूर्वक) रण-दीक्षा
में दीक्षित हुए ॥१७२॥
नियमानुसार रात्रि में शयन-गृह में जाकर सूर्यप्रभ ने निद्रा-रहित रहकर एक सुन्दरी
कन्या को वहाँ देखा ॥१७३॥
वह कन्या जान-बूझकर सोये हुए मन्त्रियोंवाले सूर्यप्रभ के पास आकर साथ खड़ी हुई
सखी से कहने लगी—॥१७४॥
'हे सखि यदि सोये हुए अतएव विकास-रहित (निश्चेष्ट) इसकी रूपशोभा ऐसी है, तो
जगी हुई दशा की शोभा कैसी होगी ॥१७५॥
अब रहने दो इसे मत जगाओ आँखों का कौतूहल पूरा हो गया। इसके साथ अधिक
दृग्मयता से हृदय को बाँधने से क्या काम है ? ॥१७६॥
श्रुतिधर्मा के साथ होनेवाले युद्ध में कौन जानता है कि किसका क्या होगा ? ॥१७७॥
युद्धोत्सव शूरों के प्राण विनाश के लिए होता है। इसका (सूर्यप्रभ का) भी जाने क्या
होगा। इसका कल्याण हो ॥१७८॥
जिस इस आकाशचारी ने कामचूड़ामणि को देखा है, वहाँ मुझ जैसी इसका क्या हृदय-
रंजन कर सकती है ? ॥१७९॥
उसके ऐसा कहने पर उसकी सखी ने कहा—'सखि ऐसा क्या कह रही हो क्या
तुम्हारा हृदय उसके प्रति आसक्त नहीं हुआ ? ॥१८०॥
जिसने देखते ही कामचूड़ामणि का हृदय हरण कर लिया वह किसका हृदय हरण नहीं
कर सकता। भले ही वह सरस्वती क्यों न हो। क्या तू अपनी विद्या के प्रभाव से युद्ध में
होनेवाले इसके कल्याण को नहीं जानती ? सिद्धों ने तुम सभी को इसी चक्रवर्ती की भार्या
बनाया है ॥१८१ १८२॥