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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक १३३
इतने में आकाशवाणी हुई कि यह चक्रवर्ती विमान तुम्हें सिद्ध हुआ है। इसके सभी नगरों
(पुरा) में अपनी-अपनी रानियाँ रखोगे तो वे शत्रुओं की बाधा से सुरक्षित रहेंगी ॥१२५ १२६॥
तब उसने प्रणाम करके गुरु याज्ञवल्क्य से निवेदन किया कि आज्ञा दीजिए कि किस
प्रकार गुरु-दक्षिणा अर्पण करूँ ॥१२७॥
अपने चक्रवर्ती-अभिषेक के समय मुझे स्मरण करना यही मेरी दक्षिणा है। अब तुम
अपने सेना शिविर में जाओ ॥१२८॥
मुनि के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ मुनि को प्रणाम कर और उस विमान पर बैठकर सुमेरु
के आश्रम में स्थित अपने सेना-शिविर में आया ॥१२९॥
वहाँ सब समाचार सुनाते हुए उसे मय सुनीथ और सुमेरु ने विमान और विद्या प्राप्ति पर
बधाई दी ॥१३० ॥
तब सुनीथ ने सुवासकुमार का स्मरण किया। उसने आकर मय आदि तथा अन्य
राजाओं से कहा—'सूर्यप्रभ को विमान भी सिद्ध होगया और सब विद्याएँ भी सिद्ध हो गईं। अब
आप लोग शत्रु पर विजय प्राप्त करने में उदासीन क्यों हो रहे हैं ? ॥१३१ १३२॥
यह सुनकर मय ने कहा— आपने सच कहा किन्तु पहले दूत भेजा जाय तो ठीक हो।
यहाँ नीति का प्रयोग करना चाहिए' ॥१३३॥
यह सुनकर मुनि-पुत्र ने कहा—'ऐसा ही करो। हानि क्या है ? प्रहस्त को दूत के रूप में
भेजो' ॥१३४॥
यह (प्रहस्त) प्रतिभाशाली गम्भीर भाषण करनेवाला कार्य और काल की स्थिति
को जाननेवाला कठोर और सहिष्णु है। इसमें दूत के सभी गुण हैं' ॥१३५॥
इस प्रकार, सुवासकुमार के वचनों पर श्रद्धा करके मय आदि ने सन्देश देकर प्रहस्त को
श्रुतशर्मा के प्रति भेजा ॥१३६॥
उसके चले जाने पर सूर्यप्रभ ने अपने उन सभी साथियों से कहा— मैंने आज जो एक
कौतूहलपूर्ण सपना देखा है उसे सुनिए—'आज रात के अन्त में मैंने देखा कि हम सभी प्रबल जल-
धारा में बहे जा रहे हैं। बहाये जाने हुए हमलोग नाच रहे हैं पर डूबते नहीं। कुछ समय बाद उस
जलका प्रवाह विपरीत वायु के कारण बदल गया ॥१३७-१३९॥